तमिलनाडु: नागपट्टिनम में पानी के अभाव में 11,000 एकड़ से ज़्यादा धान की फसल सूखने की कगार पर
तमिलनाडु के नागपट्टिनम ज़िले में किसानों पर दोहरी मार पड़ी है। कुरुवई की फसल पानी की कमी के कारण गंवाने के बाद अब उनकी 11,424 एकड़ में लगी सांबा धान की फसल पर भी सूखे का संकट मंडरा रहा है। समाचार…
तमिलनाडु के नागपट्टिनम ज़िले में किसानों पर दोहरी मार पड़ी है। कुरुवई की फसल पानी की कमी के कारण गंवाने के बाद अब उनकी 11,424 एकड़ में लगी सांबा धान की फसल पर भी सूखे का संकट मंडरा रहा है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, मेट्टूर बांध से पानी छोड़े जाने के लगभग एक महीने बाद भी ज़िले के थलैनायर क्षेत्र के खेतों तक पर्याप्त सिंचाई जल नहीं पहुँच सका है, जिससे हज़ारों किसानों की मेहनत और लागत डूबने का खतरा पैदा हो गया है।
किसानों ने सरकार द्वारा 45 दिनों तक पानी छोड़ने की घोषणा के बाद मध्यम अवधि की सांबा किस्मों की सीधी बुआई शुरू की थी। लेकिन अब वे चिंता में हैं क्योंकि बुआई के करीब 20 दिन बाद भी बीज गर्मी में सूख रहे हैं। किसानों का अनुमान है कि अगर अब पानी मिलता भी है, तो केवल 50 से 60 प्रतिशत बीजों के ही अंकुरित होने की उम्मीद है। घोषित जल-आपूर्ति की अवधि में भी अब महज़ 15 दिन बचे हैं।
सिंचाई का संकट और किसानों की मुश्किलें
इस क्षेत्र में सिंचाई मुख्य रूप से हरिचंद्र नदी पर निर्भर है। एक किसान रामनाथन एम. ने बताया कि उन्होंने 16 एकड़ में धान बोया था, लेकिन पानी न मिलने से बीज सूख गए और खेत बंजर दिखने लगे हैं। उन्होंने कहा कि थलैनायर और वेदारण्यम की ओर जाने वाली नदियों में बहुत कम पानी है और कई सहायक नहरें पूरी तरह सूखी पड़ी हैं।
इस साल मेट्टूर बांध सामान्य तारीख 12 जून के बजाय 81 दिन की देरी से 1 सितंबर को खोला गया था। किसानों का कहना है कि फसल को तैयार करने के लिए 45 दिनों की जल आपूर्ति वैसे भी अपर्याप्त है। कम बारिश ने इस समस्या को और भी गंभीर बना दिया है।
आर्थिक बोझ और प्रशासनिक चुनौतियाँ
फसलों के इस लगातार नुकसान ने किसानों को आर्थिक रूप से तोड़ दिया है। उन्होंने बताया कि कुरुवई फसल के नुकसान के बाद सांबा की खेती के लिए उन्हें निजी साहूकारों से कर्ज लेना पड़ा था। किसानों का यह भी आरोप है कि बैंकों और सहकारी समितियों से कृषि ऋण मिलना भी मुश्किल हो गया है, क्योंकि अधिकारी खेत में फसल उगने के बाद ही अडंगल प्रमाणपत्र जारी करने की बात कह रहे हैं।
जल संसाधन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, तिरुवरूर से लगभग 700 क्यूसेक पानी छोड़ा गया है, जिसके हरिचंद्र नदी तक पहुँचने की उम्मीद है। हालांकि, किसानों का कहना है कि यह पानी केवल डेढ़ दिन के लिए ही उपलब्ध होगा, जिससे आधे क्षेत्र की भी सिंचाई हो पाना मुश्किल है।
इनपुट: IANS



