रविवार, 6 सितम्बर 2026 · नई दिल्ली
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संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया के नए नक्शे की सिफारिश की, अमेरिका ने किया विरोध

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दुनिया के नक्शे को अधिक सटीक और न्यायसंगत बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। भारत समेत 164 देशों के समर्थन से पारित एक प्रस्ताव में 'इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन' वाले विश्व…

संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया के नए नक्शे की सिफारिश की, अमेरिका ने किया विरोध
(फोटो: IANS)

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दुनिया के नक्शे को अधिक सटीक और न्यायसंगत बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। भारत समेत 164 देशों के समर्थन से पारित एक प्रस्ताव में 'इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन' वाले विश्व मानचित्र को अपनाने की सिफारिश की गई है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, इस नए नक्शे का उद्देश्य सदियों से प्रचलित 'मरकेटर प्रोजेक्शन' की जगह लेना है, जिसमें उत्तरी गोलार्ध के देश अपने वास्तविक आकार से कहीं बड़े दिखते हैं।

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यह प्रस्ताव सलाहकारी प्रकृति का है, यानी किसी भी देश या संस्था के लिए इसे मानना अनिवार्य नहीं है। हालांकि, इसने वैश्विक मानचित्रण पर एक नई बहस छेड़ दी है। अमेरिका एकमात्र देश रहा जिसने इस प्रस्ताव का विरोध किया, जबकि छह देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया।

नक्शों का विवाद और ऐतिहासिक संदर्भ

मौजूदा समय में दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले अधिकांश नक्शे 16वीं सदी के फ्लेमिश मानचित्रकार जेरार्डस मरकेटर की पद्धति पर आधारित हैं। यह नक्शा मुख्य रूप से समुद्री यात्रा और नौवहन के लिए बनाया गया था, जिस दौर में यूरोपीय देश अपने उपनिवेशों का विस्तार कर रहे थे। माना जाता है कि यह नक्शा उस दौर की दुनिया को देखने के नजरिए को भी दर्शाता है, जिसमें ग्रीनलैंड जैसा क्षेत्र अफ्रीका के बराबर दिखता है, जबकि असल में अफ्रीका का क्षेत्रफल उससे 14 गुना बड़ा है। इसी तरह, दक्षिण अमेरिका का क्षेत्रफल यूरोप से 75 प्रतिशत अधिक होने के बावजूद नक्शे में यूरोप बड़ा नजर आता है।

अमेरिका का विरोध और अन्य देशों का रुख

नए 'इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन' में अमेरिका का आकार कुछ छोटा दिखाई देता है, जो उसके वास्तविक क्षेत्रफल को अधिक सही ढंग से दर्शाता है। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की उप-प्रतिनिधि यारयना फेरेंसेविच ने प्रस्ताव की आलोचना करते हुए इसे 'एक बड़े और अधिक कट्टर वैचारिक परियोजना' का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि ऐसी कोशिशों से संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है।

इसके विपरीत, रूस ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया और इसे उपनिवेशवाद-विरोधी कदम बताया, जबकि मरकेटर नक्शे में रूस का आकार बहुत बड़ा दिखता है जो नए प्रोजेक्शन में काफी कम हो जाता है। यूरोपीय संघ ने भी प्रस्ताव का समर्थन करते हुए स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य केवल शिक्षा और भूगोल की समझ को बेहतर बनाना है। फ्रांस ने तो यह घोषणा भी कर दी है कि उसका विदेश मंत्रालय अब मरकेटर नक्शों का इस्तेमाल बंद कर देगा।

क्या है इस बदलाव का मकसद?

इस अभियान का नेतृत्व करने वाले टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डसी ने कहा, “नक्शे को सुधारने का मतलब है, यह स्वीकार करना कि दुनिया के हर क्षेत्र को सही और सम्मानजनक तरीके से दिखाया जाना चाहिए।” उन्होंने जोर देकर कहा, “एक अधिक न्यायसंगत नक्शा दुनिया की भौगोलिक स्थिति को नहीं बदलता, बल्कि यह बदलता है कि हम दुनिया को कैसे देखते हैं।”

भारत के स्वरूप पर इस बदलाव का खास असर नहीं है। इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन में भारत का प्रायद्वीपीय हिस्सा मरकेटर नक्शे की तुलना में बस थोड़ा कम कोणीय और अधिक फैला हुआ दिखता है।

इनपुट: IANS

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News4Social इंटरनेशनल डेस्क

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