तमिलनाडु में हर 7 सेकंड में बिजली उत्पादन की निगरानी: नई योजना पर उत्पादकों ने उठाए सवाल
तमिलनाडु में बिजली ग्रिड को आधुनिक बनाने की एक बड़ी योजना पर ऊर्जा उत्पादकों और बिजली कंपनी के बीच मतभेद उभर आए हैं। कंपनी अब पवन और सौर ऊर्जा उत्पादन की निगरानी हर 7 सेकंड में करना चाहती है, जबकि…
तमिलनाडु में बिजली ग्रिड को आधुनिक बनाने की एक बड़ी योजना पर ऊर्जा उत्पादकों और बिजली कंपनी के बीच मतभेद उभर आए हैं। कंपनी अब पवन और सौर ऊर्जा उत्पादन की निगरानी हर 7 सेकंड में करना चाहती है, जबकि मौजूदा व्यवस्था में यह डेटा 15 दिन से एक महीने के अंतराल पर इकट्ठा होता है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्पादकों का कहना है कि मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर इतने बड़े बदलाव के लिए तैयार नहीं है और इसे लागू करने से पहले एक ट्रायल रन बेहद ज़रूरी है।
इस नई प्रणाली का उद्देश्य रिन्यूएबल एनर्जी (अक्षय ऊर्जा) के उत्पादन में होने वाले अचानक उतार-चढ़ाव पर नज़र रखना है। पवन और सौर ऊर्जा मौसम पर निर्भर होती है, जिससे बिजली की आपूर्ति घटती-बढ़ती रहती है। सुपरवाइजरी कंट्रोल एंड डेटा एक्विजिशन (SCADA) तकनीक के ज़रिए हर 7 सेकंड में डेटा सीधे स्टेट लोड डिस्पैच सेंटर को भेजा जाएगा। अधिकारियों का मानना है कि इससे ग्रिड का प्रबंधन बेहतर होगा, पीक-आवर की प्लानिंग में मदद मिलेगी और महंगी बिजली खरीदने की ज़रूरत कम होगी।
समयसीमा तय, पर ट्रायल पर असहमति
यह नियम 'तमिलनाडु इलेक्ट्रिसिटी ग्रिड कोड, 2026' का हिस्सा है, जिसके तहत रियल-टाइम डेटा देना अनिवार्य होगा। बिजली कंपनी ने सौर ऊर्जा उत्पादकों को इसी साल दिसंबर तक और पवन ऊर्जा उत्पादकों को 30 अप्रैल, 2027 तक नई प्रणाली से जुड़ने का निर्देश दिया है। हालांकि, हाल ही में हुई एक बैठक में उद्योग के प्रतिनिधियों ने इस बात पर आपत्ति जताई कि कंपनी ने पहले वादा किए गए ट्रायल रन के बिना ही इसे आगे बढ़ा दिया है।
उत्पादकों के अनुसार, मूल योजना यह थी कि पहले लगभग 1,000 पवन ऊर्जा जनरेटर के साथ सिस्टम का परीक्षण किया जाएगा। इस पायलट प्रोजेक्ट से तकनीकी खामियों को पहचानने और समाधान खोजने में मदद मिलती। तमिलनाडु में करीब 9,000 पवन ऊर्जा संयंत्र हैं, जिनकी कुल क्षमता लगभग 12,000 मेगावाट है। ऐसे में बिना परीक्षण के इसे सीधे लागू करने को लेकर चिंता जताई जा रही है।
नियम न मानने पर होगी कार्रवाई
बिजली कंपनी ने नियम तोड़ने वालों के लिए कड़े प्रावधान भी रखे हैं। जून में जारी फ्रेमवर्क के अनुसार, जो उत्पादक समयसीमा तक इस प्रणाली से नहीं जुड़ेंगे, उनके कुल उत्पादन का 10% हिस्सा शुरू में हिसाब से बाहर कर दिया जाएगा। अगर 30 दिनों तक नियम का पालन नहीं हुआ, तो पूरा उत्पादन ही सेटलमेंट से बाहर हो जाएगा और 45 दिनों के बाद आगे की कार्रवाई भी हो सकती है। फिलहाल, अधिकारियों ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि वादा किया गया ट्रायल रन क्यों नहीं किया जा रहा है।
इनपुट: IANS



