तमिलनाडु: कानून-व्यवस्था से जुड़ी जानकारी अब RTI के दायरे से बाहर, सरकार ने जारी किया आदेश
तमिलनाडु में अब आम लोगों के लिए पुलिसिंग, विरोध-प्रदर्शनों और सुरक्षा से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियों तक पहुँचना मुश्किल हो जाएगा। राज्य सरकार ने एक अहम फैसला लेते हुए अपने पब्लिक डिपार्टमेंट (लोक…
तमिलनाडु में अब आम लोगों के लिए पुलिसिंग, विरोध-प्रदर्शनों और सुरक्षा से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियों तक पहुँचना मुश्किल हो जाएगा। राज्य सरकार ने एक अहम फैसला लेते हुए अपने पब्लिक डिपार्टमेंट (लोक विभाग) के कानून-व्यवस्था विंग को सूचना का अधिकार (RTI) कानून के दायरे से बाहर कर दिया है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने इस विंग को खुफिया और सुरक्षा कार्यों में लगी संस्था के रूप में वर्गीकृत किया है।
इस आदेश का सीधा मतलब है कि अब कोई भी नागरिक सामान्य RTI आवेदन के ज़रिए इस विंग से जानकारी नहीं मांग सकेगा। सरकार का तर्क है कि कानून-व्यवस्था से जुड़ी सभी सूचनाएं सार्वजनिक नहीं की जा सकतीं। इस फैसले से विंग को संवेदनशील रिकॉर्ड से जुड़े अनुरोधों को खारिज करने का एक मज़बूत आधार मिल गया है।
कौन सी जानकारियां होंगी प्रभावित?
इस फैसले के बाद कई तरह के रिकॉर्ड तक आम लोगों की पहुंच सीमित हो जाएगी। इनमें कानून-व्यवस्था की घटनाओं, सांप्रदायिक और जातीय संघर्षों, पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारियों और हिरासत, कैदियों की मौत और पुलिस जांच से जुड़ी रिपोर्टों के लिए नियुक्त जांच आयोगों के दस्तावेज़ शामिल हैं।
इसके अलावा, छात्रों, किसानों और राजनीतिक दलों के प्रदर्शनों से संबंधित रिकॉर्ड भी अब सार्वजनिक नहीं होंगे। साथ ही, मानहानि से जुड़े लेख, समाचार क्लिपिंग और भाषण जिनकी जांच यह विंग करती है, वे भी इस छूट के दायरे में आएंगे। मुख्य सचिव के निर्देशों पर होने वाली मासिक समीक्षा बैठकों और विशेष बैठकों के रिकॉर्ड भी गोपनीय रखे जाएंगे।
क्या RTI कानून में हैं इसके लिए प्रावधान?
हालांकि, इस छूट की भी अपनी सीमाएं हैं। RTI एक्ट की धारा 24(4) राज्य सरकार को किसी खुफिया या सुरक्षा संगठन को छूट देने की शक्ति तो देती है, लेकिन यह भ्रष्टाचार और मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों से जुड़ी जानकारी पर लागू नहीं होती है।
यदि कोई RTI आवेदन मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ा है, तो उसके लिए राज्य सूचना आयोग की मंजूरी आवश्यक होगी और तय समय-सीमा में जवाब देना होगा। नियमों के मुताबिक, इस नोटिफिकेशन को राज्य विधानसभा के समक्ष भी प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य है। इस आदेश का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि विभाग अलग-अलग मामलों में इसे कैसे लागू करता है।
इनपुट: IANS



