केरल PSC परीक्षा विवाद: वामपंथी छात्र-युवा संगठनों की चुप्पी पर उठे गंभीर सवाल
केरल लोक सेवा आयोग (PSC) की एक परीक्षा में गंभीर अनियमितताओं का मामला तूल पकड़ता जा रहा है, जिसमें अब क्राइम ब्रांच की जांच और हाईकोर्ट की तीखी टिप्पणियां भी शामिल हो गई हैं। लेकिन इस पूरे प्रकरण पर…
केरल लोक सेवा आयोग (PSC) की एक परीक्षा में गंभीर अनियमितताओं का मामला तूल पकड़ता जा रहा है, जिसमें अब क्राइम ब्रांच की जांच और हाईकोर्ट की तीखी टिप्पणियां भी शामिल हो गई हैं। लेकिन इस पूरे प्रकरण पर CPI(M) से जुड़े छात्र संगठन SFI और युवा संगठन DYFI की खामोशी ने उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, यह विवाद राज्य की संवैधानिक भर्ती संस्था की साख को भी प्रभावित कर सकता है।
यह पूरा मामला स्टेट प्लानिंग बोर्ड की एक परीक्षा से जुड़ा है, जिसकी संशोधित रैंक लिस्ट हाल ही में जारी की गई। इस लिस्ट में श्याम कृष्णन पहले स्थान पर आ गए हैं, जिन्होंने मूल्यांकन में गड़बड़ियों को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ी थी। वहीं, मूल लिस्ट में टॉप करने वाले अरुण जे. प्रताप, जिन्हें वामपंथी विचारधारा का समर्थक माना जाता है, अब पांचवें स्थान पर खिसक गए हैं। प्रताप एक साल से ज़्यादा समय से नौकरी कर रहे हैं।
कानूनी पेंच और आगे की राह
नई रैंक लिस्ट के बाद PSC अब श्याम कृष्णन की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करने और प्रताप के लिए जारी नियुक्ति की सिफारिश को रद्द करने की तैयारी में है। हालांकि, चूंकि प्रताप पहले से ही पद पर कार्यरत हैं, इसलिए इस मामले में एक और कानूनी लड़ाई छिड़ने की आशंका है।
अदालती फटकार और जांच का दायरा
इस सप्ताह की शुरुआत में केरल हाईकोर्ट ने इस मामले पर सख्त रुख अपनाते हुए पूछा था कि क्या प्लानिंग बोर्ड परीक्षा में 58 अंकों के उत्तरों का मूल्यांकन न करना खुलेआम भ्रष्टाचार के बराबर है। अदालत ने ज़ोर देकर कहा कि लाखों उम्मीदवार PSC पर भरोसा करते हैं और इस भरोसे को बनाए रखना ज़रूरी है। सरकार ने भी PSC के इस दावे को खारिज कर दिया है कि यह सिर्फ एक लिपिकीय या तकनीकी गलती थी, और इसे जानबूझकर की गई हेरफेर का संकेत बताया है।
क्राइम ब्रांच की जांच में भर्ती एजेंसी द्वारा की गई अन्य नियुक्तियों में भी कथित अनियमितताएं सामने आई हैं। जांच इस बात पर केंद्रित है कि मूल्यांकन में चूक अनजाने में हुई या इसका मकसद कुछ खास उम्मीदवारों को फायदा पहुंचाना था। अदालत के संज्ञान में PSC के खिलाफ 150 से ज़्यादा अन्य शिकायतें भी लाई गई हैं, जबकि PSC ने हाईकोर्ट में क्राइम ब्रांच की जांच को ही चुनौती दी है।
चुप्पी पर उठते सवाल
यह विडंबना ही है कि SFI और DYFI जैसे संगठन, जिन्होंने हाल ही में एक सरकारी संस्थान में कांग्रेस नेता की पत्नी की अनुबंध पर नियुक्ति का विरोध किया था, इस मामले पर चुप हैं। उनकी यह चुप्पी इसलिए भी ध्यान खींच रही है क्योंकि मौजूदा 16-सदस्यीय PSC आयोग की नियुक्ति पिछली पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली LDF सरकार ने ही की थी और भर्ती प्रक्रिया भी उसी कार्यकाल में शुरू हुई थी।
इनपुट: IANS



