कोलकाता नगर निगम चुनाव: फिरहाद हकीम और सोवन चटर्जी समेत TMC के कई दिग्गज नेता मैदान से हटे
पश्चिम बंगाल में दिसंबर में होने वाले कोलकाता नगर निगम (KMC) चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस के कई वरिष्ठ और पुराने चेहरों ने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। समाचार एजेंसी IANS के मुताबिक, पूर्व मेयर…
पश्चिम बंगाल में दिसंबर में होने वाले कोलकाता नगर निगम (KMC) चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस के कई वरिष्ठ और पुराने चेहरों ने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। समाचार एजेंसी IANS के मुताबिक, पूर्व मेयर फिरहाद हकीम और सोवन चटर्जी जैसे कद्दावर नेताओं समेत कई मौजूदा पार्षदों ने भी आगामी निकाय चुनाव से दूरी बनाने का फैसला किया है, जिससे पार्टी के दोनों धड़ों के लिए उम्मीदवार ढूंढना एक बड़ी चुनौती बन गया है।
तृणमूल कांग्रेस इस समय दो गुटों में बंटी हुई है—एक का नेतृत्व पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कर रही हैं, जबकि दूसरे, डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस, का नेतृत्व विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी के हाथ में है। परिसीमन के बाद KMC में वार्डों की संख्या 144 से बढ़कर 209 हो गई है, और दोनों ही गुटों को सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने में मुश्किल आ रही है।
प्रमुख नेताओं ने क्यों बनाई दूरी?
पार्टी के बागी खेमे का एक प्रमुख चेहरा और चार बार के विधायक रहे फिरहाद हकीम ने सार्वजनिक तौर पर चुनाव न लड़ने की घोषणा की है। उन्होंने अपनी बेटी प्रियदर्शिनी के चुनाव लड़ने की अटकलों को भी खारिज कर दिया। हकीम पिछली ममता बनर्जी सरकार में कोलकाता के मेयर के साथ-साथ शहरी विकास मंत्री भी थे।
इसी तरह, कोलकाता के एक और पूर्व मेयर सोवन चटर्जी पहले ही सक्रिय राजनीति से खुद को अलग कर चुके हैं, इसलिए उनके चुनाव लड़ने की संभावना लगभग न के बराबर है। पूर्व डिप्टी मेयर अतिन घोष के सामने भी एक अलग समस्या है। उनका पुराना वार्ड अब महिलाओं के लिए आरक्षित हो गया है और वे किसी दूसरे वार्ड से चुनाव लड़ने में झिझक रहे हैं। इनके अलावा घनश्री बाह, मनीषा बसु और रत्ना सूर जैसे कई अन्य पुराने पार्षदों ने भी चुनाव नहीं लड़ने का मन बनाया है।
चुनाव न लड़ने के पीछे की वजह
हालांकि मेयर-इन-काउंसिल के दो पूर्व सदस्यों—संदीप रंजन बख्शी और स्वपन समद्दार—ने चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है, लेकिन ज़्यादातर पुराने नेता पीछे हट रहे हैं। एक वरिष्ठ पार्षद ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पार्टी के असली नाम और चुनाव चिह्न को लेकर कानूनी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। इस वजह से यह अनिश्चितता है कि उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार के लिए पार्टी फंड मिलेगा या नहीं। उन्होंने कहा, "आज के समय में किसी भी उम्मीदवार के लिए अपनी जेब से पूरा चुनावी खर्च उठाना लगभग असंभव है।"
इनपुट: IANS



