विदेशी निवेशकों की जानकारी सार्वजनिक करने की माँग, सुप्रीम कोर्ट ने महुआ मोइत्रा की याचिका ख़ारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा की उस याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया जिसमें विदेशी संस्थाओं के 'वास्तविक लाभार्थी मालिकों' की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की गई…
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा की उस याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया जिसमें विदेशी संस्थाओं के 'वास्तविक लाभार्थी मालिकों' की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की गई थी। अदालत ने कहा कि ऐसा करने के लिए देश में कोई मौजूदा कानूनी या नियामक ढाँचा नहीं है, जिसके अभाव में ऐसा आदेश जारी नहीं किया जा सकता।
समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, मोइत्रा ने अपनी याचिका में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) को यह निर्देश देने का आग्रह किया था कि वह भारत में सक्रिय अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (AIF) और फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPI) के 'अल्टीमेट बेनिफिशियल ओनर्स' (UBO) और उनके निवेश पोर्टफोलियो का पूरा विवरण सार्वजनिक करे। हालांकि, अदालत ने मोइत्रा को अपनी शिकायतें लेकर केंद्र सरकार और सेबी से संपर्क करने की छूट दी है।
कानूनी ढाँचे के अभाव में निर्देश संभव नहीं: सुप्रीम कोर्ट
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, आर. महादेवन और डी.के. उपाध्याय की पीठ ने कहा कि जब UBO की जानकारी को पूरी तरह से सार्वजनिक करने के लिए कोई कानून या नियम ही नहीं है, तो सर्वोच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत 'रिट ऑफ मैंडमस' (परमादेश) जारी नहीं कर सकता। पीठ ने टिप्पणी की, "अगर कोई ऐसी नीति है जिसके तहत सार्वजनिक रूप से खुलासा करना जरूरी है, और आप उसे लागू करने के लिए 'मैंडमस' की मांग करते हैं, तो वह एक अलग बात है। लेकिन अगर कोई नीति ही मौजूद नहीं है, तो क्या हम ऐसा आदेश जारी कर सकते हैं?"
याचिका में क्या थीं दलीलें?
सुनवाई के दौरान महुआ मोइत्रा की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि विदेशी संस्थाओं के माध्यम से भारतीय कंपनियों में भारी निवेश हो रहा है, जबकि असली निवेशकों की पहचान छिपी हुई है। उन्होंने कहा कि इस पारदर्शिता की कमी से सेबी के नियमों के उल्लंघन और शेयर बाजार में हेरफेर की आशंका बनी रहती है। भूषण ने यह भी बताया कि कई देशों में 'लाभकारी स्वामित्व' की जानकारी सार्वजनिक करना अनिवार्य है।
वहीं, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि इसका असली मकसद देश में विदेशी निवेश को रोकना है। इस पर प्रशांत भूषण ने जवाब दिया कि 'वास्तविक लाभार्थी मालिकों' का खुलासा करने से वैध निवेश पर कोई असर नहीं पड़ेगा। अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि AIF और FPI द्वारा किए गए निवेश का ब्योरा सेबी या कस्टोडियन को दिया जाता है, जिससे नियामक निगरानी संभव है।
इनपुट: IANS



