मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 · नई दिल्ली
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शिक्षक भर्ती: ट्रांसजेंडरों को जगह क्यों नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार से जवाब मांगा

शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में ट्रांसजेंडरों के लिए अलग श्रेणी न होने और विज्ञापनों में पदों को सिर्फ पुरुष और महिला में बांटने पर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार से तीखे सवाल किए हैं। शीर्ष अदालत ने इस…

शिक्षक भर्ती: ट्रांसजेंडरों को जगह क्यों नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार से जवाब मांगा
(फोटो: IANS)

शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में ट्रांसजेंडरों के लिए अलग श्रेणी न होने और विज्ञापनों में पदों को सिर्फ पुरुष और महिला में बांटने पर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार से तीखे सवाल किए हैं। शीर्ष अदालत ने इस मामले में दिल्ली सरकार को 15 दिनों के भीतर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, यह सुनवाई सरकारी नौकरियों में ट्रांसजेंडरों की पहुंच और उम्र में छूट जैसे अहम मुद्दों से जुड़ी है।

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यह पूरा मामला जेन कौशिक द्वारा दायर एक याचिका से शुरू हुआ था, जिसे बाद में प्रवीण सिंह ने आगे बढ़ाया। याचिका में दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (DSSSB) द्वारा जारी भर्ती विज्ञापनों में ट्रांसजेंडरों को शामिल न करने को चुनौती दी गई है।

कानूनी आधार पर सुप्रीम कोर्ट के सवाल

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने दिल्ली सरकार और DSSSB से कई अहम सवाल पूछे हैं। अदालत ने जानना चाहा है कि क्या भर्ती नियमों में शिक्षकों के पदों को पुरुष और महिला के लिए अलग-अलग विज्ञापित करना अनिवार्य है? अगर नहीं, तो इस तरह के वर्गीकरण का उद्देश्य क्या है? बेंच ने यह भी पूछा कि क्या अधिकारी भविष्य की भर्तियों में 'थर्ड जेंडर' को शामिल करने पर विचार कर रहे हैं और सार्वजनिक रोजगार में उन्हें किस तरह समायोजित किया जाएगा।

याचिकाकर्ता की दलील और पिछली कार्यवाही

याचिकाकर्ता जेन कौशिक ने दलील दी थी कि DSSSB के ऑनलाइन पोर्टल पर रजिस्टर्ड होने के बावजूद उन्हें नियुक्ति के चरण में बाहर किया जा सकता है, क्योंकि भर्ती प्रक्रिया सिर्फ विज्ञापन में बताए गए पुरुष या महिला उम्मीदवारों पर ही विचार करती है।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें यह राहत दी थी कि वह भर्ती विज्ञापन में बताए लिंग की परवाह किए बिना, ट्रांसजेंडर श्रेणी के तहत आवेदन कर सकती हैं। शीर्ष अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के 18 दिसंबर, 2025 के उस फैसले को भी प्रथम दृष्टया गलत माना था, जिसमें याचिकाकर्ता को एक सलाहकार समिति के पास भेज दिया गया था, जबकि समिति के पास न्यायिक शक्तियां नहीं थीं। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडरों से जुड़े मुद्दों की जांच के लिए पूर्व न्यायाधीश आशा मेनन की अध्यक्षता में एक सलाहकार समिति का गठन भी किया था।

इनपुट: IANS

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