बुधवार, 28 अक्टूबर 2026 · नई दिल्ली
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विधायकों के इस्तीफे से उपचुनाव का बोझ क्यों उठाए जनता? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग से मांगा जवाब

अगर कोई विधायक बिना किसी ठोस वजह के अपनी सीट से इस्तीफा दे देता है, तो क्या उससे उपचुनाव पर होने वाले सरकारी खर्च की वसूली की जानी चाहिए? इस महत्वपूर्ण सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव…

विधायकों के इस्तीफे से उपचुनाव का बोझ क्यों उठाए जनता? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग से मांगा जवाब
(फोटो: IANS)

अगर कोई विधायक बिना किसी ठोस वजह के अपनी सीट से इस्तीफा दे देता है, तो क्या उससे उपचुनाव पर होने वाले सरकारी खर्च की वसूली की जानी चाहिए? इस महत्वपूर्ण सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। यह मामला एक याचिका के बाद शीर्ष अदालत पहुंचा है, जिसमें ऐसे जनप्रतिनिधियों पर आर्थिक जवाबदेही तय करने की मांग की गई है।

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समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, यह याचिका वकील के. सुथन ने दायर की है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस पर सुनवाई करते हुए केंद्र, चुनाव आयोग (ECI), तमिलनाडु के मुख्य चुनाव अधिकारी और राज्य के छह पूर्व विधायकों को नोटिस जारी किया है। दरअसल, इन छह विधायकों ने स्वेच्छा से इस्तीफा दे दिया था, जिसके कारण उनकी सीटों पर उपचुनाव कराने पड़े।

क्या है याचिकाकर्ता की मांग?

याचिका में 'चुनाव व्यय सुरक्षा' नामक एक प्रणाली बनाने का निर्देश देने की मांग की गई है। इसके तहत, यदि कोई विधायक बिना किसी वैध कारण के इस्तीफा देता है, तो उसे दोबारा चुनाव लड़ने से पहले उपचुनाव की अनुमानित लागत के बराबर राशि जमा करने के लिए कहा जाए। याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की है कि ऐसे जनप्रतिनिधियों को पांच साल के लिए चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए।

तमिलनाडु के मामले से उठा विवाद

याचिका का आधार तमिलनाडु का एक हालिया घटनाक्रम है। 4 मई को विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के कुछ ही हफ्तों बाद, AIADMK के छह विधायकों ने अपनी सीटों से इस्तीफा दे दिया और बाद में वे सत्तारूढ़ दल में शामिल हो गए। याचिका में कहा गया है कि इन विधायकों का इस्तीफा ठीक उस समय आया जब उनमें से कुछ के खिलाफ पार्टी व्हिप का उल्लंघन करने के आरोप में अयोग्यता की कार्यवाही शुरू की गई थी। याचिका के अनुसार, इस्तीफे के कारण ये विधायक न केवल लंबित कार्यवाही से बच गए, बल्कि उन्हें एक अलग पार्टी के बैनर तले फिर से चुनाव लड़ने का मौका भी मिल गया। इस प्रक्रिया में हुए उपचुनावों से सरकारी खजाने पर अनावश्यक वित्तीय बोझ पड़ा।

चुनाव आयोग की पुरानी सिफारिश

याचिका में इस बात का भी उल्लेख है कि चुनाव आयोग ने 2004 में ही अपने चुनाव सुधार प्रस्तावों में यह सिफारिश की थी कि जो उम्मीदवार अपनी सीट छोड़कर उपचुनाव की स्थिति पैदा करते हैं, उन्हें इसका खर्च वहन करना चाहिए। हालांकि, यह सिफारिश आज तक लागू नहीं हो पाई है।

हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की थी याचिका?

सुप्रीम कोर्ट से पहले याचिकाकर्ता ने मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन वहां उनकी जनहित याचिका खारिज कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने 24 सितंबर को अपने फैसले में कहा था कि मांगी गई राहत में एक नया वित्तीय और दंडात्मक ढांचा बनाना शामिल है, जो विधायी नीति के दायरे में आता है, न कि न्यायिक निर्देशों के। हाईकोर्ट के अनुसार, "किसी विधायी सीट से इस्तीफा देने का अधिकार संवैधानिक योजना का एक पहलू है और इस पर न्यायिक आदेश द्वारा अतिरिक्त-वैधानिक शर्तें नहीं थोपी जा सकतीं।" इसी फैसले को अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

इनपुट: IANS

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News4Social राजनीति डेस्क

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