जांच का तरीका तय करना एजेंसी का काम, हाई कोर्ट सुझाव न दे: सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि जांच एजेंसी को किसी आरोपी से किस तरह पूछताछ करनी चाहिए, इस पर हाई कोर्ट को कोई सुझाव या निर्देश नहीं देना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह…
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि जांच एजेंसी को किसी आरोपी से किस तरह पूछताछ करनी चाहिए, इस पर हाई कोर्ट को कोई सुझाव या निर्देश नहीं देना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह पूरी तरह से जांच एजेंसी के विवेक पर निर्भर करता है कि वह हिरासत में पूछताछ (कस्टोडियल इंटरोगेशन) करना चाहती है या नहीं।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने एक दंपति को अग्रिम जमानत देते हुए की। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात के इस दंपति पर एक स्कूल प्राचार्य के सेवा रिकॉर्ड में हेरफेर करने का आरोप था, ताकि उनकी जन्मतिथि बदलकर सेवानिवृत्ति की अवधि बढ़ाई जा सके।
मामला क्या था और हाई कोर्ट ने क्या कहा था?
यह मामला गुजरात के मितेशगिरी उर्फ मुलराजगिरी सेवागिरी गोस्वामी और इलाबेन मितेशगिरी गोस्वामी से जुड़ा है। मितेशगिरी एक स्कूल में प्राचार्य थे और इलाबेन स्कूल की प्रबंधन समिति की अध्यक्ष। अभियोजन पक्ष के अनुसार, उन्होंने प्राचार्य के सेवा रिकॉर्ड में उनकी जन्मतिथि 19 जून 1964 से बदलकर 19 जून 1965 कर दी, जिससे सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा।
इस मामले में गुजरात हाई कोर्ट ने 16 जून 2026 को उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था, "सच्चाई सामने लाने के लिए केवल आवेदक ही नहीं, बल्कि अन्य सभी संदिग्धों से भी हिरासत में पूछताछ आवश्यक है।"
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की इस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई। न्यायमूर्ति भुइयां की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, "हमारा स्पष्ट मत है कि किसी आरोपी से किस प्रकार पूछताछ की जाए, इसका सुझाव देना हाई कोर्ट का काम नहीं है। यह निर्णय जांच एजेंसी के विवेक पर छोड़ा जाना चाहिए।"
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह की व्यापक टिप्पणी उन लोगों के अधिकारों को भी प्रभावित कर सकती है, जिन्हें मामले में अभी तक आरोपी भी नहीं बनाया गया है। अदालत के अनुसार, "हाई कोर्ट को ऐसी अनावश्यक टिप्पणियों से बचना चाहिए।"
आरोपियों को मिली राहत
मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि प्राथमिकी (एफआईआर) मुख्य रूप से दस्तावेजी सबूतों पर आधारित है। पीठ ने कहा, "अपीलकर्ताओं के खिलाफ लगाए गए आरोपों की प्रकृति को देखते हुए, जो पूरी तरह दस्तावेजों पर आधारित हैं, हम मानते हैं कि उनकी हिरासत में पूछताछ आवश्यक नहीं है।"
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाई कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और दंपति को दी गई अंतरिम जमानत को स्थायी कर दिया। उन्हें जांच में सहयोग जारी रखने का निर्देश दिया गया है।
इनपुट: IANS



