सोमवार, 2 नवम्बर 2026 · नई दिल्ली
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भ्रष्टाचार के आरोप: तमिलनाडु के पूर्व मंत्री के.एन. नेहरू को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं, FIR रहेगी बरकरार

तमिलनाडु के पूर्व मंत्री और डीएमके के वरिष्ठ नेता के.एन. नेहरू को भ्रष्टाचार से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली है। सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को उनकी वह याचिका खारिज कर दी…

भ्रष्टाचार के आरोप: तमिलनाडु के पूर्व मंत्री के.एन. नेहरू को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं, FIR रहेगी बरकरार
(फोटो: IANS)

तमिलनाडु के पूर्व मंत्री और डीएमके के वरिष्ठ नेता के.एन. नेहरू को भ्रष्टाचार से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली है। सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को उनकी वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ FIR दर्ज करने के मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी थी। यह मामला उनके मंत्री रहते हुए नगर प्रशासन एवं जल आपूर्ति विभाग (MAWS) में भर्तियों में कथित रिश्वतखोरी से जुड़ा है।

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समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और शील नागू की पीठ ने मद्रास उच्च न्यायालय के 20 फरवरी के फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया। हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय की टिप्पणियों से नेहरू को उचित समय पर अपना बचाव पेश करने में कोई बाधा नहीं आएगी।

क्या हैं भर्ती घोटाले के आरोप?

ये आरोप के.एन. नेहरू के मंत्री कार्यकाल के दौरान MAWS विभाग में 2,538 पदों पर हुई भर्तियों से संबंधित हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने नौकरियों के बदले रिश्वत लेने का आरोप लगाया है। ED के अनुसार, इसमें सरकारी नियुक्तियों के लिए रिश्वत लेना और विभाग की निविदा प्रक्रियाओं में हेरफेर करना शामिल था। एजेंसी ने अवैध रिश्वत की रकम 630 करोड़ से 1,020 करोड़ रुपये के बीच होने का अनुमान लगाया था।

संघीय एजेंसी ने अपनी जांच में डिजिटल साक्ष्यों का भी हवाला दिया है, जिनमें मंत्री से जुड़े लोगों के ठिकानों से बरामद व्हाट्सएप चैट, स्क्रीनशॉट और वित्तीय रिकॉर्ड शामिल हैं। ED ने अक्टूबर 2025 में तमिलनाडु के डीजीपी को यह सामग्री भेजकर मंत्री और उनके सहयोगियों पर कार्रवाई की मांग की थी।

कैसे सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला?

राज्य के अधिकारियों द्वारा मामला दर्ज न किए जाने पर यह मामला याचिकाओं के जरिए मद्रास उच्च न्यायालय पहुंचा। 20 फरवरी को उच्च न्यायालय ने सतर्कता एवं भ्रष्टाचार विरोधी निदेशालय (DVAC) को ED द्वारा साझा की गई सामग्री के आधार पर FIR दर्ज कर जांच करने का निर्देश दिया।

इस निर्देश के खिलाफ के.एन. नेहरू और तत्कालीन डीएमके सरकार ने पुनर्विचार याचिकाएं दायर की थीं। बाद में, 2026 के विधानसभा चुनावों के बाद राज्य में सरकार बदलने पर नई सरकार ने अपनी याचिका वापस ले ली। हालांकि, 26 अक्टूबर को उच्च न्यायालय ने नेहरू की स्वतंत्र पुनर्विचार याचिका भी यह कहते हुए खारिज कर दी कि उसका पिछला निर्देश सिर्फ मामला दर्ज करने और जांच तक सीमित था, किसी के अपराध का निर्धारण नहीं करता। इसी फैसले के खिलाफ नेहरू ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

इनपुट: IANS

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News4Social राजनीति डेस्क

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