मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 · नई दिल्ली
देश

CSR फंड में 200 करोड़ की हेराफेरी: 12वीं पास शख्स डॉक्टर बनकर चलाता था रैकेट, ED की 4 राज्यों में छापेमारी

कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) की आड़ में 200 करोड़ रुपये की कथित मनी लॉन्ड्रिंग के एक बड़े मामले का पर्दाफाश हुआ है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, इस सिलसिले में प्रवर्तन निदेशालय…

CSR फंड में 200 करोड़ की हेराफेरी: 12वीं पास शख्स डॉक्टर बनकर चलाता था रैकेट, ED की 4 राज्यों में छापेमारी
(फोटो: IANS)

कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) की आड़ में 200 करोड़ रुपये की कथित मनी लॉन्ड्रिंग के एक बड़े मामले का पर्दाफाश हुआ है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, इस सिलसिले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात और दिल्ली-एनसीआर समेत चार राज्यों में आठ ठिकानों पर छापेमारी की है। इस कार्रवाई के दौरान 21 लाख रुपये नकद और कई डिजिटल सबूत ज़ब्त किए गए।

विज्ञापन

ईडी की जांच का केंद्र धर्मेंद्र कुमार चंद्रवीर सिंह नामक व्यक्ति है, जिस पर जुहू पुलिस स्टेशन में दर्ज एक FIR के आधार पर मनी लॉन्ड्रिंग का मामला शुरू किया गया था। जांच में सामने आया कि सिंह के पास कोई मेडिकल डिग्री नहीं थी और उसने सिर्फ़ 12वीं तक की पढ़ाई की थी। इसके बावजूद, वह लगभग तीन दशकों तक खुद को डॉक्टर बताकर एक बड़ा नेटवर्क चलाता रहा।

डॉक्टर बनकर कैसे किया गया घोटाला?

जांच एजेंसी के मुताबिक, धर्मेंद्र सिंह ने अपनी 'डॉक्टर' की झूठी पहचान का इस्तेमाल कर चैरिटेबल ट्रस्ट और संस्थाओं का एक नेटवर्क खड़ा किया। ये संस्थाएं कागज़ों पर तो स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी CSR गतिविधियों में लगी हुई दिखती थीं, लेकिन इनका असली मकसद सरकारी और निजी कंपनियों से भारी मात्रा में CSR फंड जुटाना था। अधिकारियों ने बताया कि देश भर के कम से कम 40 सार्वजनिक उपक्रमों (PSU) और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने सिंह द्वारा संचालित ट्रस्टों को CSR के तहत डोनेशन दिया था।

फंड को ठिकाने लगाने का तरीका

ED ने अपनी जांच में पाया कि इस रैकेट का संचालन बेहद योजनाबद्ध तरीके से किया जा रहा था।

सिफारिश और कमीशन का खेल: जांच से पता चला कि जब अस्पतालों या स्वास्थ्य संस्थानों को महंगे उपकरणों के लिए फंड की कमी होती थी, तो उन्हें जन-प्रतिनिधियों से संपर्क कराया जाता था। ये जन-प्रतिनिधि इन प्रोजेक्ट्स के लिए सिंह के ट्रस्टों के ज़रिए फंड देने की सिफ़ारिश करते थे। PSU ने मुख्य रूप से इन्हीं सिफारिशों के आधार पर डोनेशन जारी किए। इसके बदले CSR फंडिंग दिलाने वाले बिचौलियों को कमीशन और किकबैक भी दिए जाते थे।

फर्जी बिल और अधूरी परियोजनाएं: कई परियोजनाएं या तो अधूरी छोड़ दी गईं या मिले हुए फंड के मुकाबले बहुत कम काम किया गया। साथ ही, उपकरण आपूर्तिकर्ताओं के बिलों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया और अतिरिक्त पैसे को फर्जी या शेल कंपनियों के ज़रिए घुमाया गया। जांच में यह भी सामने आया है कि निजी कंपनियों से मिले CSR योगदान का एक बड़ा हिस्सा, छोटा कमीशन काटकर, नकद में वापस कर दिया जाता था।

यह तलाशी 1 अक्टूबर को प्रवर्तन निदेशालय के मुंबई ज़ोनल ऑफिस-I द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA), 2002 के प्रावधानों के तहत की गई थी। इस कार्रवाई से चैरिटेबल ट्रस्ट, ट्रस्टी, CSR एजेंटों और बिचौलियों के एक ऐसे नेटवर्क का खुलासा हुआ है जो इस फंड की हेराफेरी में शामिल थे।

इनपुट: IANS

N

News4Social नेशनल डेस्क

News4Social नेशनल डेस्क — IANS समेत लाइसेंस-प्राप्त समाचार एजेंसियों की फीड से राष्ट्रीय घटनाक्रम से जुड़ी ताज़ा व प्रामाणिक खबरें संपादकीय समीक्षा के बाद प्रकाशित करता है। हर खबर उसके स्रोत के श्रेय (credit) के साथ दी जाती है। सभी लेख देखें →

आगे पढ़ें

और देखें →