शनिवार, 7 नवम्बर 2026 · नई दिल्ली
दुनिया

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर बढ़ते अत्याचार: मानवाधिकार संगठन ने जबरन धर्म परिवर्तन और हिंसा पर जताई चिंता

पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ लगातार हो रहे उत्पीड़न पर एक प्रमुख मानवाधिकार संगठन ने गहरी चिंता व्यक्त की है। 'वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी' (VOPM) ने ईशनिंदा के आरोपों, लक्षित हिंसा और…

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर बढ़ते अत्याचार: मानवाधिकार संगठन ने जबरन धर्म परिवर्तन और हिंसा पर जताई चिंता
(फोटो: IANS)

पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ लगातार हो रहे उत्पीड़न पर एक प्रमुख मानवाधिकार संगठन ने गहरी चिंता व्यक्त की है। 'वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी' (VOPM) ने ईशनिंदा के आरोपों, लक्षित हिंसा और जबरन धर्म परिवर्तन के बढ़ते मामलों पर ध्यान आकर्षित किया है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, संगठन ने 2026 की पहली छमाही के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि केवल सरकारी आश्वासनों से इन पीड़ितों की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता।

विज्ञापन

संगठन ने 'यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम' (USCIRF) द्वारा दर्ज मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि ये घटनाएं भेदभावपूर्ण कानूनों, कमजोर जवाबदेही और सरकारी सुरक्षा की कमी के गंभीर परिणामों को दर्शाती हैं।

नाबालिग लड़कियों के अपहरण और जबरन विवाह के मामले

रिपोर्ट में तीन नाबालिग लड़कियों के अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और विवाह के मामलों पर प्रकाश डाला गया है, जो सहमति, बाल सुरक्षा और न्याय तक पहुंच पर गंभीर सवाल उठाते हैं।

एक मामले में, 12 वर्षीय ईसाई लड़की मारिया के अपहरण के आरोपी 30 वर्षीय व्यक्ति से उसकी शादी को एक अदालत ने वैध ठहरा दिया। वहीं, नेहा के परिवार ने आरोप लगाया कि एक व्यक्ति ने उसे सिलाई केंद्र से अगवा कर जबरन उसका धर्म परिवर्तन कराया और पुलिस ने शुरू में कार्रवाई करने में देरी की। इसी तरह, सोनिया नामक एक अन्य लड़की के परिवार ने भी अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप लगाया। उसके जन्म प्रमाण पत्र में उम्र 15 वर्ष बताई गई थी, जबकि अपहरणकर्ताओं ने उसकी उम्र 20 वर्ष होने का दावा किया।

ईशनिंदा के झूठे आरोप और न्याय में देरी

VOPM ने दो ईसाई नर्सों, नविश अरूज और मरयम लाल के मामले का भी उल्लेख किया, जो यह दर्शाता है कि कैसे अदालती फैसले से पहले ही ईशनिंदा के आरोप किसी की जिंदगी तबाह कर सकते हैं। अप्रैल 2021 में एक सहकर्मी द्वारा इस्लामी धार्मिक लेख वाले स्टिकर का अपमान करने का आरोप लगाए जाने के बाद दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया था।

उन्हें पांच महीने हिरासत में बिताने पड़े और बाद में छिपकर रहना पड़ा। फरवरी 2026 में, अदालत ने गवाहों के बयानों में विरोधाभास और सबूतों की कमी के कारण उन्हें बरी कर दिया। संगठन का कहना है कि यह फैसला अहम था, लेकिन यह उन वर्षों की पीड़ा और असुरक्षा को कम नहीं कर सकता जो उन्होंने झेली।

कानून और सरकारी ज़िम्मेदारी पर सवाल

संगठन ने कहा कि जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ ईसाई सांसद फाल्बूस क्रिस्टोफर द्वारा प्रस्तावित कानून एक सकारात्मक कदम हो सकता है, लेकिन इसका निष्पक्ष कार्यान्वयन अधिक महत्वपूर्ण है। VOPM ने जोर देकर कहा, "पाकिस्तान के धार्मिक अल्पसंख्यकों को लंबे समय तक पीड़ा सहने के बाद मिलने वाली बरी होने की राहत या किसी हमले के बाद किए गए वादों से ज्यादा की जरूरत है। उन्हें ऐसे संस्थानों की जरूरत है जो अत्याचार को रोकें, तुरंत कार्रवाई करें और न्याय दिलाएं। उनकी सुरक्षा कोई एहसान नहीं, बल्कि राज्य की जिम्मेदारी है।"

इनपुट: IANS

N

News4Social इंटरनेशनल डेस्क

News4Social इंटरनेशनल डेस्क — IANS समेत लाइसेंस-प्राप्त समाचार एजेंसियों की फीड से अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम से जुड़ी ताज़ा व प्रामाणिक खबरें संपादकीय समीक्षा के बाद प्रकाशित करता है। हर खबर उसके स्रोत के श्रेय (credit) के साथ दी जाती है। सभी लेख देखें →

आगे पढ़ें

और देखें →