सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 · नई दिल्ली
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चुनाव प्रचार में बच्चों का इस्तेमाल 'गलत चलन' और 'खराब परवरिश' का संकेत: मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट ने राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव प्रचार और सोशल मीडिया रील्स में बच्चों को शामिल करने की प्रथा की कड़ी आलोचना की है। अदालत ने इसे एक 'गलत चलन' बताते हुए कहा कि यह न केवल गरिमा के खिलाफ…

चुनाव प्रचार में बच्चों का इस्तेमाल 'गलत चलन' और 'खराब परवरिश' का संकेत: मद्रास हाईकोर्ट
(फोटो: IANS)

मद्रास हाईकोर्ट ने राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव प्रचार और सोशल मीडिया रील्स में बच्चों को शामिल करने की प्रथा की कड़ी आलोचना की है। अदालत ने इसे एक 'गलत चलन' बताते हुए कहा कि यह न केवल गरिमा के खिलाफ है, बल्कि खराब परवरिश को भी दर्शाता है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, यह टिप्पणी तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) के विधायक के. शिवकुमार से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की गई।

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मामला सलेम नॉर्थ विधानसभा क्षेत्र से टीवीके विधायक के. शिवकुमार की जीत को चुनौती देने वाली एक चुनावी याचिका से संबंधित था। हालांकि अदालत ने विधायक की जीत को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी, लेकिन न्यायाधीश ने चुनाव प्रक्रिया में बच्चों के इस्तेमाल पर गंभीर चिंता व्यक्त की।

प्रचार में बच्चों की भूमिका पर अदालत की टिप्पणी

याचिका में आरोप लगाया गया था कि टीवीके प्रमुख जोसेफ विजय ने सीधे बच्चों से अपील की थी कि वे अपने माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को पार्टी के चुनाव चिह्न 'सीटी' पर वोट देने के लिए मनाएं। इसके बाद सोशल मीडिया पर कई ऐसी रील्स सामने आईं, जिनमें बच्चे अपने बड़ों पर टीवीके को वोट देने का दबाव बनाते दिखे।

इस पर जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती ने कहा, "न तो राजनीतिक दल और न ही उनके उम्मीदवार किसी भी चुनावी गतिविधि में बच्चों को शामिल कर सकते हैं।" उन्होंने कहा कि इस तरह के प्रचार में बच्चों को शामिल करना पूरी तरह से गलत और अनुचित है।

'अनुचित प्रभाव' और संसद की भूमिका

अदालत ने इस सवाल पर विचार किया कि क्या किसी नेता का बच्चों से अपने माता-पिता को प्रभावित करने के लिए कहना जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत 'अनुचित प्रभाव' माना जाएगा। अदालत ने पाया कि इन वीडियो रील्स को बनाने और प्रचारित करने में घर के वयस्क शामिल थे। बच्चों ने स्वतंत्र रूप से काम नहीं किया, इसलिए इसे वयस्कों के निर्णय को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाला नहीं माना जा सकता।

हालांकि, अदालत ने इस मुद्दे को बड़ा बताते हुए कहा कि ऐसी गतिविधियों पर रोक लगनी चाहिए या नहीं, और क्या इन्हें चुनाव रद्द करने का आधार बनाया जाना चाहिए, इस पर संसद को विचार करने की जरूरत है। अदालत ने के. शिवकुमार द्वारा दायर उस अर्जी को स्वीकार कर लिया जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दायर चुनाव याचिका को खारिज करने की मांग की थी।

इनपुट: IANS

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