खैबर पख्तूनख्वा: जनरल मुनीर की 'कठोर नीति' से क्या पाकिस्तान में असंतोष और बढ़ेगा?
पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर की 'हार्ड-स्टेट' (कठोर राज्य) नीति खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में एक बड़ी चुनौती का सामना कर रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह नीति इस विचार पर आधारित है कि किसी भी…
पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर की 'हार्ड-स्टेट' (कठोर राज्य) नीति खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में एक बड़ी चुनौती का सामना कर रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह नीति इस विचार पर आधारित है कि किसी भी विरोध को कुचलने के लिए पर्याप्त बल का प्रयोग न करना ही समस्या की जड़ है। हालांकि, प्रांत की 4 करोड़ से अधिक आबादी, मजबूत राजनीतिक संगठन और अफगानिस्तान से लगी सीमा जैसी जटिलताओं के चलते यह रणनीति यहां असंतोष को और बढ़ा सकती है।
समाचार एजेंसी IANS के हवाले से 'ग्रीक सिटी टाइम्स' की एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि खैबर पख्तूनख्वा में सरकार के हालिया कदमों के सुरक्षा संबंधी परिणाम, किसी भी संभावित आर्थिक लाभ से कहीं ज़्यादा गंभीर हो सकते हैं। रिपोर्ट का मानना है कि इस नीति से उग्रवादी संगठनों को अपनी बात रखने के लिए एक मजबूत मुद्दा मिल जाएगा, जिससे प्रांत में वैसी ही स्थिति पैदा हो सकती है जिसने बलूचिस्तान को प्रशासनिक रूप से बेहद मुश्किल बना दिया था।
कानूनी बदलाव और खनिज संसाधनों पर नियंत्रण
रिपोर्ट में इस बात पर भी सवाल उठाए गए हैं कि क्या इस्लामाबाद ने प्रांत के खनिज संसाधनों पर नियंत्रण हासिल करने के लिए चुनी हुई सरकार को सत्ता से हटाया। दरअसल, पाकिस्तान के 18वें संवैधानिक संशोधन के अनुसार खनिज प्रांतीय विषय हैं, लेकिन अब वहां ऐसी कोई विधानसभा नहीं है जो इस अधिकार का इस्तेमाल कर सके।
11 अक्टूबर 2026 को खैबर पख्तूनख्वा में एक विशेष संवैधानिक व्यवस्था लागू की गई, जिसने प्रांत के खनिजों पर संघीय नियंत्रण की राह खोल दी। रिपोर्ट के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद 232 और 234 के तहत सैन्य प्रतिष्ठान के समर्थन से केंद्र सरकार ने आपातकालीन शक्तियां और गवर्नर शासन लागू कर दिया। इसके तहत, संघीय और प्रांतीय कानूनों में टकराव की स्थिति में संघीय कानून ही प्रभावी होगा। इसके अलावा, मुख्यमंत्री सोहैल अफरीदी को 'निवारक हिरासत' में ले लिया गया है।
बिगड़ते सुरक्षा हालात और आर्थिक चुनौतियां
इस्लामाबाद ने प्रांत में आपातकाल लगाने के लिए बिगड़ती सुरक्षा स्थिति का हवाला दिया है। आंकड़े भी इसी ओर इशारा करते हैं। वर्ष 2026 की पहली छमाही में पुलिसकर्मियों की मौत का आंकड़ा 122 तक पहुंच गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 63 था। वहीं, जुलाई से सितंबर 2026 के बीच हिंसा से जुड़ी मौतों की संख्या 556 दर्ज की गई, जो पिछली तिमाही के 475 के आंकड़े से अधिक है।
रिपोर्ट के अनुसार, खराब सुरक्षा हालात का हवाला देकर सैन्य प्रतिष्ठान केंद्र से अधिक धन की मांग कर सकता है और साथ ही प्रांत के खनिज संसाधनों पर अपना नियंत्रण भी मजबूत कर सकता है। हालांकि, खनिज भंडारों का पूरा भूवैज्ञानिक आकलन न होने, प्रसंस्करण क्षमता सीमित होने और बिगड़ती सुरक्षा के कारण इन संसाधनों का दोहन उम्मीद के मुताबिक आसान नहीं होगा।
इनपुट: IANS



