मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 · नई दिल्ली
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जम्मू: रोहिंग्याओं पर कार्रवाई को उमर अब्दुल्ला ने बताया 'अजीब', केंद्र की नीति पर उठाए सवाल

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मंगलवार को रोहिंग्या शरणार्थियों के खिलाफ हुई हालिया प्रशासनिक कार्रवाई की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि इन लोगों को बिना किसी वजह के निशाना बनाया जा रहा…

जम्मू: रोहिंग्याओं पर कार्रवाई को उमर अब्दुल्ला ने बताया 'अजीब', केंद्र की नीति पर उठाए सवाल
(फोटो: IANS)

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मंगलवार को रोहिंग्या शरणार्थियों के खिलाफ हुई हालिया प्रशासनिक कार्रवाई की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि इन लोगों को बिना किसी वजह के निशाना बनाया जा रहा है, जबकि भारत ने उन्हें मानवीय आधार पर शरण दी थी।

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समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, उमर अब्दुल्ला ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, "रोहिंग्या, जिन्हें बिना किसी वजह के निशाना बनाया जा रहा है, जब उन्हें उनके देश से निकाला गया था तो हमने उन्हें यहां जगह दी थी।" उन्होंने आगे कहा, "हमने उन्हें तब तक यहां रहने की इजाजत दी थी जब तक उनके देश के हालात बेहतर न हो जाएं। मुझे अचानक उनके खिलाफ कार्रवाई करना अजीब लगता है।" हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह मामला भारत सरकार के अधिकार क्षेत्र में है।

बांग्लादेशी नागरिकों पर भी हुई थी कार्रवाई

यह बयान उस घटना के बाद आया है, जिसमें सोमवार को जम्मू-कश्मीर में अवैध रूप से रह रहे 250 बांग्लादेशी नागरिकों को भारतीय वायु सेना (IAF) के विमान से पश्चिम बंगाल भेजा गया था। वहां से उन्हें बांग्लादेश वापस भेजने की प्रक्रिया की जाएगी। अब्दुल्ला ने अपने बयान में बांग्लादेश से बिना अनुमति के आए लोगों के मामले को रोहिंग्याओं के मामले से अलग बताया।

यूनिफॉर्म सिविल कोड पर क्या कहा?

इस मौके पर मुख्यमंत्री ने यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने साफ किया कि जम्मू-कश्मीर सरकार इसे लागू नहीं करेगी। उन्होंने केंद्र सरकार को चुनौती देते हुए कहा, "ऐसे कानून पर संसद में बहस होनी चाहिए और इसे संसद द्वारा ही बनाया जाना चाहिए। अगर हिम्मत है तो संसद में कानून लाएं।"

गौरतलब है कि यूसीसी भारत में सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत मामलों में एक समान कानून बनाने का प्रस्ताव है। संविधान के अनुच्छेद 44 में इसका उल्लेख है, लेकिन यह कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। इसके समर्थक इसे लैंगिक न्याय और राष्ट्रीय एकता के लिए जरूरी मानते हैं, जबकि आलोचक इसे धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विविधता के लिए खतरा बताते हैं।

इनपुट: IANS

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News4Social नेशनल डेस्क

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