बाजार का नया अनुमान: निफ्टी 50 दिसंबर 2026 तक छू सकता है 25,000 का स्तर, पर कई चुनौतियां बरकरार
कमजोर वैश्विक आर्थिक माहौल, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारतीय शेयर बाजार के लिए एक नया अनुमान सामने आया है। एक प्रतिष्ठित ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन ने अपनी ताजा रिपोर्ट में…
कमजोर वैश्विक आर्थिक माहौल, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारतीय शेयर बाजार के लिए एक नया अनुमान सामने आया है। एक प्रतिष्ठित ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि बेंचमार्क सूचकांक निफ्टी 50 दिसंबर 2026 तक 25,000 के स्तर तक पहुंच सकता है। हालांकि, समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, फर्म ने पहले यह लक्ष्य 26,000 निर्धारित किया था, जिसे अब मौजूदा चुनौतियों को देखते हुए संशोधित किया गया है।
रिपोर्ट में लक्ष्य घटाने के पीछे कई कारण गिनाए गए हैं। इनमें कमजोर वैश्विक अर्थव्यवस्था, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी बाधाएं और भारतीय कंपनियों की आय में किसी बड़े सुधार की उम्मीद न होना शामिल है। बर्नस्टीन के विश्लेषकों का कहना है कि 25,000 का संशोधित लक्ष्य मौजूदा स्तर से लगभग 8.1 प्रतिशत की बढ़त को दर्शाता है। यह अनुमान वित्त वर्ष 2027-28 की अनुमानित आय पर 18 गुना के वैल्यूएशन मल्टीपल पर आधारित है।
टैक्स कटौती और विदेशी निवेश
रिपोर्ट में लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स में संभावित कटौती के असर पर भी विश्लेषण किया गया है। बर्नस्टीन का मानना है कि पूंजी की जरूरत वाली अर्थव्यवस्था के लिए यह कटौती एक सकारात्मक कदम तो होगी, लेकिन सिर्फ इसी एक बदलाव से विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) के निरंतर निवेश की गारंटी नहीं मिल जाएगी। रिपोर्ट में एक विश्लेषक के हवाले से कहा गया है, "एलटीसीजी में कटौती की घोषणा से बाजार में एक-दो दिन की तेज रैली देखने को मिल सकती है, लेकिन कई निवेशक इसका उपयोग अपने निवेश निकालने के अवसर के रूप में भी कर सकते हैं।"
अर्थव्यवस्था और अन्य जोखिम
ब्रोकरेज हाउस ने कुछ अन्य निकट-अवधि के जोखिमों की ओर भी ध्यान दिलाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, कमजोर मानसून और जलाशयों में पानी का सामान्य से काफी कम स्तर चिंता का विषय बना हुआ है। वहीं, बॉन्ड यील्ड मजबूत हो रही हैं और कच्चे तेल समेत अन्य कमोडिटी की कीमतें भी एक चुनौती हैं।
बर्नस्टीन ने यह भी कहा कि नीतिगत समर्थन की गुंजाइश भी सीमित नजर आती है, क्योंकि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से मिलने वाले लाभ धीरे-धीरे कम हो सकते हैं। इन सबके अलावा, अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर अस्पष्टता और रूस से तेल आपूर्ति से जुड़े जोखिम भी बने हुए हैं, जो आर्थिक वृद्धि की राह में बाधा डाल सकते हैं।
इनपुट: IANS



