मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 · नई दिल्ली
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मेट्टूर बांध से पानी छोड़ने में देरी की मांग, तमिलनाडु के किसानों को सांबा फसल की चिंता

तमिलनाडु के नागपट्टिनम जिले के किसान चिंतित हैं कि मेट्टूर बांध से तय समय पर पानी छोड़े जाने से उनकी सांबा धान की फसल खतरे में पड़ सकती है। उन्होंने राज्य सरकार से 1 सितंबर को प्रस्तावित जल निकासी को…

मेट्टूर बांध से पानी छोड़ने में देरी की मांग, तमिलनाडु के किसानों को सांबा फसल की चिंता
(फोटो: IANS)

तमिलनाडु के नागपट्टिनम जिले के किसान चिंतित हैं कि मेट्टूर बांध से तय समय पर पानी छोड़े जाने से उनकी सांबा धान की फसल खतरे में पड़ सकती है। उन्होंने राज्य सरकार से 1 सितंबर को प्रस्तावित जल निकासी को कम से कम 10 दिनों के लिए टालने का आग्रह किया है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, किसानों का कहना है कि 45 दिनों की नियोजित जल आपूर्ति खेती के लिए अपर्याप्त होगी।

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किसानों की चिंता का मुख्य कारण यह है कि मेट्टूर बांध से पानी छोड़े जाने के बाद भी उसे नागपट्टिनम की नहरों तक पहुंचने में लगभग 10 दिन लग जाते हैं, क्योंकि यह जिला कावेरी डेल्टा के अंतिम छोर पर स्थित है। इससे उन्हें सिंचाई के लिए प्रभावी रूप से बहुत कम समय मिलेगा। किसानों को डर है कि बांध से पानी की आपूर्ति बंद होने और उत्तर-पूर्वी मानसून के आने के बीच करीब 15 दिनों का अंतर हो सकता है, जिससे खड़ी फसलें सूख सकती हैं।

सिंचाई की कमी और मानसून पर निर्भरता

कृषि विशेषज्ञों और किसान नेताओं ने भी इस मामले पर अपनी राय व्यक्त की है। सीपीआई (एम) के राज्य सचिव पी. शनमुगम के अनुसार, धान की खेती के लिए 45 दिनों का पानी अपर्याप्त है, क्योंकि सांबा फसलों को कम से कम 120 दिनों तक सिंचाई की आवश्यकता होती है। इसी तरह, थलैनायर के एक किसान पी. सेंथिल कुमार ने कहा कि अगर पानी की आपूर्ति बंद होने के बाद मानसून में देरी हुई या वह कमजोर रहा, तो किसानों को गंभीर संकट का सामना करना पड़ेगा।

नागपट्टिनम जैसे तटीय जिले में कृषि पूरी तरह कावेरी नदी के पानी और उत्तर-पूर्वी मानसून पर निर्भर है, क्योंकि यहां का भूजल खारा होने के कारण सिंचाई के लिए उपयुक्त नहीं है। तमिलनाडु किसान संरक्षण संघ के एसआर तमिलसेल्वन ने बताया कि पानी की सीमित उपलब्धता के कारण अब सांबा की खेती का दायरा मानसून के प्रदर्शन पर ही निर्भर करेगा।

सरकार से परामर्श और पिछले वर्षों का उदाहरण

किसानों में इस बात को लेकर भी नाराज़गी है कि सरकार ने यह फैसला लेने से पहले उनसे सलाह नहीं ली। तमिलनाडु किसान संघ के राज्य महासचिव सामी नटराजन ने कहा कि जब बांध में पानी का स्तर कम था, तो सरकार को किसानों के साथ बैठक करनी चाहिए थी। उन्होंने पिछले वर्षों का उदाहरण देते हुए कहा कि जल संकट के दौरान 2002 में 6 सितंबर, 2012 में 17 सितंबर और 2016 में 20 सितंबर को पानी छोड़ा गया था। उन्होंने आग्रह किया कि सरकार इस साल भी सितंबर के दूसरे सप्ताह में पानी छोड़े, ताकि फसल के महत्वपूर्ण चरण में सिंचाई उपलब्ध हो सके।

इनपुट: IANS

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News4Social नेशनल डेस्क

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