केरल के स्वास्थ्य मंत्री का इस्तीफ़े से इनकार, CPI(M) की पूर्व महिला मंत्रियों पर किया पलटवार
केरल में स्वास्थ्य क्षेत्र को लेकर छिड़ा राजनीतिक विवाद गहरा गया है। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के. मुरलीधरन ने शुक्रवार को इस्तीफ़ा देने की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने अपने ऊपर लगे…
केरल में स्वास्थ्य क्षेत्र को लेकर छिड़ा राजनीतिक विवाद गहरा गया है। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के. मुरलीधरन ने शुक्रवार को इस्तीफ़ा देने की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देते हुए CPI(M) की तीन पूर्व महिला स्वास्थ्य मंत्रियों के कार्यकाल पर गंभीर सवाल उठाए।
यह पूरा मामला स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) से पीड़ित बच्चों की दवाओं को लेकर उठे विवाद से शुरू हुआ। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक दिन पहले ही CPI(M) की वरिष्ठ नेता और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री पी.के. श्रीमती, के.के. शैलजा और वीणा जॉर्ज ने एक साथ आकर मौजूदा सरकार की स्वास्थ्य नीतियों की तीखी आलोचना की थी। उन्होंने 'केवल क्लिनिकल ट्रायल के लिए' लिखी दवाओं के वितरण पर सवाल उठाते हुए मरीज़ों की सुरक्षा पर चिंता जताई थी।
पुराने कार्यकाल पर मुरलीधरन के आरोप
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मुरलीधरन ने पिछली वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि अब वह दौर बीत चुका है, जब ऑपरेशन के दौरान कथित तौर पर मरीज़ों के शरीर में सर्जिकल कैंची छूट जाती थी। उन्होंने तीनों पूर्व मंत्रियों पर व्यक्तिगत टिप्पणी करते हुए कहा कि अपनी ही पार्टी द्वारा उपेक्षित की गईं ये तीनों नेता अब उनके खिलाफ एकजुट हो गई हैं।
मुरलीधरन ने आरोप लगाया कि एक पूर्व मंत्री के समय में संक्रमण से बच्चों की मौत हुई, तो दूसरी के कार्यकाल में निपाह वायरस के प्रकोप ने जानें लीं। उन्होंने तीसरी पूर्व मंत्री पर अपने साथ मारपीट होने का झूठा दावा करने का भी आरोप लगाया। उन्होंने स्पष्ट किया, "मुझे कांग्रेस पार्टी ने मंत्री बनाया है" और वह अपने पद से नहीं हटेंगे।
दवा खरीद पर क्या है विवाद?
पूर्व मंत्रियों ने आरोप लगाया था कि सरकार की गैर-जिम्मेदाराना नीति के कारण मरीज़ों को जीवन रक्षक दवाएं मिलने में मुश्किल हो रही है। पी.के. श्रीमती ने दावा किया कि LDF सरकार के दस साल के शासन में दवाएं मुफ्त मिलती थीं और उनकी कमी की कोई शिकायत नहीं थी। उन्होंने यह भी कहा कि केरल मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन के ज़रिए होने वाली स्थापित खरीद प्रक्रिया को नज़रअंदाज़ किया गया, जिससे भ्रष्टाचार और वितरण की समस्याएं पैदा हुईं।
इसके जवाब में मुरलीधरन ने कहा कि सरकार SMA मरीज़ों के लिए आयातित दवा की जगह भारत में बनी दवा का ही इस्तेमाल जारी रखेगी। उन्होंने इस विवाद के लिए कुछ टीवी चैनलों की रिपोर्टिंग को ज़िम्मेदार ठहराया और विदेशी दवा कंपनियों की भूमिका की ओर भी इशारा किया।
विशेषज्ञ ने किया सरकार का समर्थन
इस बीच, प्रसिद्ध न्यूरोसर्जन और केरल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति बी. इकबाल ने स्वास्थ्य विभाग के फैसले का समर्थन किया है। उन्होंने नैटको द्वारा निर्मित कम कीमत वाली जेनेरिक दवा 'रिसडिप्लाम' के उपयोग को इलाज को ज़्यादा किफ़ायती बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। फिलहाल, दवा खरीद और पिछली सरकार के रिकॉर्ड को लेकर यह टकराव एक बड़े राजनीतिक संघर्ष में बदल गया है।
इनपुट: IANS



