बेंगलुरु रिंग रोड शुभा हत्याकांड: 2003 के दोषियों की दया याचिकाओं पर कर्नाटक कैबिनेट ले सकती है फैसला
करीब दो दशक पुराने बेंगलुरु के चर्चित 'रिंग रोड शुभा मर्डर केस' के दोषियों की दया याचिकाओं पर कर्नाटक कैबिनेट गुरुवार को होने वाली अपनी बैठक में विचार कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट से उम्रकैद की सज़ा…
करीब दो दशक पुराने बेंगलुरु के चर्चित 'रिंग रोड शुभा मर्डर केस' के दोषियों की दया याचिकाओं पर कर्नाटक कैबिनेट गुरुवार को होने वाली अपनी बैठक में विचार कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट से उम्रकैद की सज़ा बरकरार रहने के बाद, शुभा शंकरनारायण और तीन अन्य सह-आरोपियों ने राज्यपाल के समक्ष दया याचिका दायर की थी। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, राज्यपाल कार्यालय ने इन याचिकाओं को राज्य सरकार के पास उनकी राय जानने के लिए भेज दिया है।
अब गृह विभाग के माध्यम से यह मामला कैबिनेट के सामने रखा जाएगा, जहाँ इस पर चर्चा होगी। कैबिनेट यह तय करेगी कि दोषियों की सज़ा माफ़ करने की सिफारिश की जाए या उनकी याचिकाओं को खारिज कर दिया जाए। अपनी राय तय करने के बाद सरकार एक रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपेगी, जो इस प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा है।
क्या था यह चर्चित हत्याकांड?
यह मामला 3 दिसंबर 2003 का है, जब इंटेल कंपनी के 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर बी.वी. गिरीश की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। यह घटना उनकी शुभा के साथ सगाई होने के महज़ चार दिन बाद हुई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, शुभा अपने परिवार द्वारा तय किए गए इस रिश्ते के खिलाफ थी और उसने अपने साथियों के साथ मिलकर गिरीश को रास्ते से हटाने की साजिश रची थी।
जांच के मुताबिक, शुभा 'हवाई जहाज की लैंडिंग' दिखाने के बहाने गिरीश को आउटर रिंग रोड के एक सुनसान इलाके में ले गई। वहां पहले से मौजूद उसके साथियों अरुण वर्मा, वेंकटेश और दिनेश ने लोहे की रॉड से गिरीश पर हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल गिरीश की बाद में अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई।
अदालती प्रक्रिया और सुप्रीम कोर्ट का फैसला
इस मामले में चारों आरोपियों — शुभा, अरुण वर्मा, वेंकटेश और दिनेश — को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या) और 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत दोषी ठहराया गया और उम्रकैद की सजा सुनाई गई। कर्नाटक हाईकोर्ट ने निचली अदालत के इस फैसले को बरकरार रखा, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।
सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को सही ठहराया। हालांकि, अदालत ने जबरन शादी से जुड़े सामाजिक और पारिवारिक दबावों का संज्ञान लेते हुए दोषियों को अपनी गिरफ्तारी से पहले राज्यपाल के पास दया याचिका दायर करने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया था। इसी के तहत दोषियों ने दया की गुहार लगाई है, जिस पर अब राज्य सरकार को अपना रुख स्पष्ट करना है।
इनपुट: IANS



