CMRL केस: विजयन के बचाव में माकपा का 15 साल पुराना दांव, लेकिन इस बार बदला है किरदार
केरल में सीएमआरएल-एक्सालॉजिक मामले को लेकर मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के खिलाफ FIR के अदालती निर्देश के बाद उनकी पार्टी माकपा (CPI-M) बचाव की मुद्रा में आ गई है। पार्टी ने इस मामले से कानूनी और…
केरल में सीएमआरएल-एक्सालॉजिक मामले को लेकर मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के खिलाफ FIR के अदालती निर्देश के बाद उनकी पार्टी माकपा (CPI-M) बचाव की मुद्रा में आ गई है। पार्टी ने इस मामले से कानूनी और राजनीतिक, दोनों स्तरों पर लड़ने का ऐलान किया है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, इस घटनाक्रम ने लगभग 15 साल पुराने एक बयान की याद दिला दी है, जो पार्टी के तत्कालीन महासचिव प्रकाश करात ने दिया था, लेकिन इस बार हालात और विजयन का पद, दोनों अलग हैं।
यह पूरा मामला कोचीन मिनरल्स एंड रूटाइल लिमिटेड (सीएमआरएल) और एक्सालॉजिक सॉल्यूशंस के बीच हुए वित्तीय लेन-देन से जुड़ा है। एक्सालॉजिक सॉल्यूशंस कंपनी मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की बेटी टी. वीना से संबंधित है। केरल हाई कोर्ट ने शुक्रवार को इस मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत FIR दर्ज करने का निर्देश दिया है, जिसके बाद से ही राजनीतिक बहस छिड़ गई है।
क्या था 2009 का वो बयान?
साल 2009 में जब एसएनसी-लावालिन मामले में पिनाराई विजयन का नाम आया था, तब भी उनके इस्तीफे की मांग उठी थी। उस वक्त पार्टी के महासचिव रहे प्रकाश करात ने यह कहकर बचाव किया था कि विजयन किसी सरकारी पद पर नहीं हैं, इसलिए उनके इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता। उस समय विजयन सिर्फ पार्टी के राज्य सचिव थे। करात ने कहा था कि पार्टी इस मामले को कानूनी और राजनीतिक रूप से लड़ेगी।
अब क्यों अलग हैं हालात?
पार्टी आज भी वही तर्क दे रही है, लेकिन एक बड़ा अंतर है। पिनाराई विजयन अब सिर्फ पार्टी पदाधिकारी नहीं, बल्कि केरल के मुख्यमंत्री हैं, जो एक संवैधानिक और कैबिनेट रैंक का पद है। इसी वजह से यह सवाल उठ रहा है कि जो तर्क 2009 में दिया गया था, क्या वह आज भी एक मुख्यमंत्री पर लागू होता है? यह कानूनी मामला अभी शुरुआती चरण में है और हाई कोर्ट का आदेश केवल जांच की शुरुआत है, इसे दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता।
माकपा के नेता एम.ए. बेबी ने पार्टी के रुख को दोहराते हुए कहा कि यह मामला राजनीति से प्रेरित है। उन्होंने केंद्रीय एजेंसियों पर विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने का आरोप लगाया। फिलहाल, माकपा के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ अदालत में अपने नेता का बचाव करना और दूसरी तरफ अपने राजनीतिक सिद्धांतों की निरंतरता को स्पष्ट करना।
इनपुट: IANS



