भारतीय विनिर्माण क्षेत्र में शानदार तेजी, उत्पादन और रोजगार दोनों में मजबूत वृद्धि दर्ज
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत के विनिर्माण यानी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने उत्पादन और रोजगार, दोनों ही मोर्चों पर दमदार प्रदर्शन किया है। सरकार द्वारा जारी 'उद्योगों के वार्षिक सर्वेक्षण' (ASI) के…
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत के विनिर्माण यानी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने उत्पादन और रोजगार, दोनों ही मोर्चों पर दमदार प्रदर्शन किया है। सरकार द्वारा जारी 'उद्योगों के वार्षिक सर्वेक्षण' (ASI) के नवीनतम आंकड़ों से यह तस्वीर सामने आई है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, इस अवधि में औद्योगिक उत्पादन में साल-दर-साल 7.81 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो इस क्षेत्र की मजबूत होती बुनियाद का संकेत है।
सर्वेक्षण के अनुसार, यह वृद्धि सिर्फ उत्पादन तक सीमित नहीं रही, बल्कि रोजगार के अवसर पैदा करने में भी यह सेक्टर आगे रहा। वित्त वर्ष 2025 के दौरान मैन्युफैक्चरिंग में रोजगार 7.19 प्रतिशत बढ़ा है। इसके साथ ही, कर्मचारियों को दिए जाने वाले कुल वेतन और भत्तों में भी 12.08 प्रतिशत की प्रभावशाली बढ़ोतरी देखी गई, जो कर्मचारियों की आय में सुधार को दर्शाता है।
राज्यों और उद्योगों का प्रदर्शन
आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों की संख्या भी बढ़ी है। वित्त वर्ष 2024 में जहां 2.60 लाख प्रतिष्ठान थे, वहीं वित्त वर्ष 2025 में यह संख्या बढ़कर 2.67 लाख हो गई। सबसे ज्यादा 41,221 इकाइयों के साथ तमिलनाडु इस सूची में शीर्ष पर है। इसके बाद गुजरात (33,084) और महाराष्ट्र (27,379) का स्थान आता है।
रोजगार देने के मामले में तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश और हरियाणा देश के शीर्ष पांच राज्य बनकर उभरे हैं। देश के कुल मैन्युफैक्चरिंग रोजगार में इन पांच राज्यों की हिस्सेदारी 56 प्रतिशत से भी ज्यादा है। वहीं, पांच प्रमुख उद्योगों - बेसिक मेटल्स, मोटर गाड़ियां, रसायन, फार्मा और खाद्य उत्पाद - ने मिलकर देश के कुल मैन्युफैक्चरिंग जीवीए (ग्रॉस वैल्यू एडेड) में 45% से अधिक का योगदान दिया।
सर्वेक्षण का महत्व
उद्योगों का वार्षिक सर्वेक्षण (ASI) भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण पैमाना है। इसके जरिए विभिन्न विनिर्माण उद्योगों के विकास, पूंजी निर्माण, आउटपुट और रोजगार जैसे कई प्रमुख आर्थिक संकेतकों में हो रहे बदलावों को समझा जाता है। ये आंकड़े न केवल नीति-निर्माण में मदद करते हैं, बल्कि राष्ट्रीय लेखा-जोखा तैयार करने के लिए भी एक अहम आधार प्रदान करते हैं।
इनपुट: IANS



