भारत की हरित ऊर्जा क्रांति: कैसे दुनिया के लिए प्रेरणा बना, उपराष्ट्रपति ने बताया पूरा खाका
भारत ने अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में जो तरक्की की है, वह न केवल देश की एक बड़ी कामयाबी है, बल्कि दुनिया के विकासशील देशों (ग्लोबल साउथ) के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण भी बन गई है। समाचार एजेंसी IANS की…
भारत ने अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में जो तरक्की की है, वह न केवल देश की एक बड़ी कामयाबी है, बल्कि दुनिया के विकासशील देशों (ग्लोबल साउथ) के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण भी बन गई है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह बात उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने गुरुवार को नई दिल्ली में आयोजित 'भारत रिन्यूएबल एनर्जी समिट एंड एक्सपो 2026' के समापन समारोह में कही।
उन्होंने बताया कि एक दशक पहले जिन आशंकाओं पर सवाल उठाए जाते थे, भारत ने अपनी उपलब्धियों से उनका जवाब दे दिया है। पहले यह माना जाता था कि भारत जैसा विशाल विकासशील देश जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करते हुए तेज आर्थिक विकास नहीं कर सकता, लेकिन बीते 10 वर्षों ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया है।
समय से पहले हासिल हुए लक्ष्य
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि भारत की गैर-जीवाश्म ईंधन (जैसे सौर, पवन ऊर्जा) पर आधारित स्थापित बिजली क्षमता 300 गीगावाट को पार कर चुकी है। सबसे अहम बात यह है कि देश ने अपनी कुल बिजली उत्पादन क्षमता का 50 प्रतिशत गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल करने का लक्ष्य 2025 में ही पूरा कर लिया, जो कि निर्धारित समय-सीमा से पांच साल पहले की एक बड़ी उपलब्धि है।
सौर ऊर्जा: महंगी से सबसे सस्ती तक का सफर
उपराष्ट्रपति ने सौर ऊर्जा में हुई क्रांति पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में देश की सौर ऊर्जा क्षमता 3 गीगावाट से भी कम से बढ़कर 170 गीगावाट से अधिक हो गई है। एक समय था जब सौर ऊर्जा को कोयले से बनने वाली बिजली से कई गुना महंगा माना जाता था, लेकिन आज यह भारत में ऊर्जा के सबसे सस्ते स्रोतों में से एक है। उनके अनुसार, यह बदलाव सरकार की दूरदर्शी नीतियों, निजी क्षेत्र की भागीदारी और राज्यों व नागरिकों के सामूहिक प्रयासों से संभव हुआ है।
आम आदमी और किसान बन रहे 'ऊर्जादाता'
हरित ऊर्जा का लाभ अब आम लोगों तक भी पहुंच रहा है। उपराष्ट्रपति ने बताया कि 'पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना' के तहत 65 लाख से ज्यादा परिवार सौर ऊर्जा आंदोलन से जुड़ चुके हैं, जिससे उन्हें सस्ती और स्वच्छ बिजली मिल रही है। इसी तरह, 'पीएम-कुसुम' योजना से लगभग 30 लाख किसानों को फायदा हुआ है। सौर पंपों से न केवल किसानों का डीजल खर्च कम हो रहा है, बल्कि वे अतिरिक्त बिजली बेचकर कमाई भी कर रहे हैं, जिससे वे 'अन्नदाता' के साथ-साथ 'ऊर्जादाता' भी बन रहे हैं।
दूरदराज के इलाकों तक बिजली की पहुंच
श्री राधाकृष्णन ने 'पीएम-जनमन' और 'धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान' जैसी पहलों का भी उल्लेख किया। इन योजनाओं के माध्यम से उन दूर-दराज के जनजातीय गांवों तक बिजली पहुंचाई जा रही है, जहां पारंपरिक बिजली ग्रिड ले जाना मुश्किल था। उन्होंने कहा, "बिजली तक पहुंच लोगों के जीवन में शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार और रोजगार के अवसर लाकर व्यापक बदलाव लाती है।"
भविष्य की ऊर्जा, यानी हाइड्रोजन पर बात करते हुए उन्होंने विश्वास जताया कि तकनीकी विकास के चलते आने वाले वर्षों में यह और भी सुलभ और सस्ती हो जाएगी। उपराष्ट्रपति ने उद्योग और शिक्षण संस्थानों के बीच अधिक सहयोग पर बल देते हुए कहा कि 2040 की तकनीकें आज की प्रयोगशालाओं और स्टार्टअप्स से ही निकलेंगी, इसलिए अनुसंधान और नवाचार को प्राथमिकता देना जरूरी है।
इनपुट: IANS



