बुधवार, 4 नवम्बर 2026 · नई दिल्ली
टेक्नोलॉजी

डेटा सेंटर का गढ़ बनेगा भारत? 2030 तक 5 गुना क्षमता वृद्धि और ₹3 लाख करोड़ के निवेश का अनुमान

भारत के डिजिटल भविष्य को ताकत देने वाले डेटा सेंटर्स के क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति आने की उम्मीद है। एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च 2030 तक भारत की डेटा सेंटर क्षमता पांच गुना बढ़कर लगभग 7.5 गीगावाट…

डेटा सेंटर का गढ़ बनेगा भारत? 2030 तक 5 गुना क्षमता वृद्धि और ₹3 लाख करोड़ के निवेश का अनुमान
(फोटो: IANS)

भारत के डिजिटल भविष्य को ताकत देने वाले डेटा सेंटर्स के क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति आने की उम्मीद है। एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च 2030 तक भारत की डेटा सेंटर क्षमता पांच गुना बढ़कर लगभग 7.5 गीगावाट तक पहुंच सकती है। समाचार एजेंसी IANS के हवाले से मिली क्रिसिल की इस रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि इस विशाल विस्तार को साकार करने के लिए अगले चार वित्त वर्षों में इस सेक्टर में 3 लाख करोड़ रुपए से ज़्यादा का निवेश आ सकता है।

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इस तेज रफ्तार वृद्धि के पीछे कई बड़े कारण हैं। इनमें जेनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की वजह से बढ़ती कंप्यूटिंग पावर की ज़रूरत, कंपनियों का तेजी से होता डिजिटलीकरण और लगातार बढ़ती डेटा खपत शामिल हैं।

क्यों भारत बन रहा है आकर्षक केंद्र?

क्रिसिल रेटिंग्स के निदेशक आनंद कुलकर्णी के अनुसार, भारत में डेटा सेंटर स्थापित करने की लागत कई दूसरे प्रतिस्पर्धी एशियाई बाजारों की तुलना में काफी कम है, जो इसे एक आकर्षक गंतव्य बनाता है। उन्होंने बताया, "जमीन, निर्माण और श्रम की अधिक प्रतिस्पर्धी लागत के कारण भारत में डेटा सेंटर के विकास की लागत एशिया-प्रशांत क्षेत्र के कई प्रतिस्पर्धी बाजारों की तुलना में लगभग पांचवां हिस्सा (20 प्रतिशत) कम है।"

कुलकर्णी ने आगे स्पष्ट किया कि बिजली की सस्ती दरें भी एक बड़ा फायदा हैं। इन सब वजहों से भारत में डेटा सेंटरों का किराया दूसरे प्रतिस्पर्धी बाजारों के मुकाबले 30-35 प्रतिशत तक कम हो जाता है। साथ ही, भारत में बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा से चलने वाले कैंपस विकसित करने की क्षमता भी है, जो हाइपरस्केलर्स (बड़ी टेक कंपनियां) के सस्टेनेबिलिटी लक्ष्यों के अनुकूल है।

निवेश और भविष्य की संभावनाएं

रिपोर्ट यह भी बताती है कि आने वाली नई डेटा सेंटर क्षमता का लगभग आधा हिस्सा पहले से ही लंबी अवधि के अनुबंधों के तहत बुक हो चुका है। ये अनुबंध क्लाउड सेवाओं और AI जैसी तकनीकों के लिए हाइपरस्केलर्स के साथ किए गए हैं, जो शुरुआत से ही एक निश्चित राजस्व की गारंटी देते हैं और परियोजना से जुड़े जोखिम को कम करते हैं।

क्रिसिल रेटिंग्स के एसोसिएट डायरेक्टर नितिन बंसल ने कहा, "अनुबंधित राजस्व की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है। अनुबंध की अवधि पहले के 10-12 वर्षों से बढ़कर 15-20 वर्ष हो गई है, जिससे नकदी प्रवाह का अनुमान अधिक स्पष्ट हुआ है।" हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि अनुबंधों के नवीनीकरण का एक मज़बूत ट्रैक रिकॉर्ड अभी बनना बाकी है।

चुनौतियाँ और प्रमुख शहर

इस तेज विस्तार के साथ कुछ चुनौतियां भी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, समय पर बिजली कनेक्शन, नियामक मंजूरियां और परियोजनाओं का अनुशासित क्रियान्वयन इस विस्तार की गति और डेवलपर्स की क्रेडिट गुणवत्ता तय करेगा।

आने वाली 6 गीगावाट क्षमता का करीब तीन-चौथाई हिस्सा मुख्य रूप से तीन शहरों — विशाखापत्तनम, मुंबई और हैदराबाद — में विकसित होने की उम्मीद है। इन शहरों में डेटा सेंटरों की वजह से बिजली की मांग तेजी से बढ़ेगी, जो इन शहरों की मौजूदा अधिकतम बिजली मांग का क्रमशः लगभग 80%, 60% और 20% तक हो सकती है। यह समय पर ग्रिड कनेक्टिविटी और बिजली ट्रांसमिशन क्षमता बढ़ाने की जरूरत को दर्शाता है।

इनपुट: IANS

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