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भारत-EFTA व्यापार समझौता: 100 अरब डॉलर के निवेश से 2040 तक 20 लाख नौकरियों का रास्ता

भारत और चार यूरोपीय देशों के समूह EFTA के बीच हुए व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौते (TEPA) से देश की अर्थव्यवस्था को बड़ी रफ्तार मिलने की उम्मीद है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार…

भारत-EFTA व्यापार समझौता: 100 अरब डॉलर के निवेश से 2040 तक 20 लाख नौकरियों का रास्ता
(फोटो: IANS)

भारत और चार यूरोपीय देशों के समूह EFTA के बीच हुए व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौते (TEPA) से देश की अर्थव्यवस्था को बड़ी रफ्तार मिलने की उम्मीद है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, उद्योग मंडल एसोचैम का अनुमान है कि इस समझौते से साल 2040 तक भारत में 10 लाख से 20 लाख तक नए रोजगार पैदा हो सकते हैं। यह समझौता न केवल निवेश लाएगा, बल्कि औद्योगिक प्रतिस्पर्धा को भी बढ़ावा देगा।

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EFTA समूह में स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड और लिकटेंस्टीन जैसे विकसित देश शामिल हैं। इस समझौते के तहत इन देशों ने भारत में अगले 15 वर्षों के दौरान 100 अरब डॉलर का भारी-भरकम निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई है। इस निवेश का पहला बड़ा हिस्सा, यानी 50 अरब डॉलर, शुरुआती 10 सालों में ही भारत आएगा।

निवेश से निर्यात तक के अवसर

एसोचैम के अध्यक्ष निर्मल के. मिंडा के अनुसार, अब असली चुनौती इस 100 अरब डॉलर के निवेश और 10 लाख प्रत्यक्ष नौकरियों के लक्ष्य को वास्तविक परियोजनाओं और रोजगार में बदलना है। उन्होंने कहा, "उन्नत विनिर्माण और ग्रीन हाइड्रोजन में काफी संभावनाएं हैं और इन साझेदारियों में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को भी अभिन्न हिस्सा बनाना होगा।"

यह समझौता भारतीय निर्यातकों के लिए भी नए दरवाजे खोल रहा है। EFTA देशों ने अपनी 92.2% टैरिफ लाइनों पर शुल्क में छूट देने की पेशकश की है, जिससे भारत के लगभग 99.6% निर्यात को इन बाजारों में सीधी पहुंच मिल जाएगी। फार्मा, कपड़ा, इंजीनियरिंग उत्पाद, रसायन, प्रोसेस्ड फूड और समुद्री उत्पाद जैसे क्षेत्रों को इससे विशेष लाभ मिलने की संभावना है। वहीं, भारत ने भी समझौते में अपने डेयरी, सोया और कोयला जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के हितों का ध्यान रखा है।

व्यापार और नई तकनीक में साझेदारी

दोनों पक्षों के बीच द्विपक्षीय व्यापार पहले ही 26.7 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। EFTA देश दुनिया भर से सालाना करीब 628 अरब डॉलर का आयात करते हैं, जो भारतीय कारोबारियों के लिए एक बहुत बड़ा अवसर है। एसोचैम के महासचिव सौरभ सान्याल ने कहा कि जैविक रसायनों के आयात में भारत की 8.9% हिस्सेदारी बताती है कि अभी फार्मा, मशीनरी, ऑटोमोबाइल और कपड़ा जैसे कई क्षेत्रों में विस्तार की काफी गुंजाइश है।

समझौते के तहत भविष्य की तकनीकों पर भी ज़ोर दिया गया है। भारत का 2030 तक सालाना 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य है। इसमें नॉर्वे की समुद्री तकनीक, आइसलैंड की भू-तापीय ऊर्जा विशेषज्ञता और स्विट्जरलैंड की इलेक्ट्रोलाइजर तकनीक महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। इसके अलावा, AI, रोबोटिक्स और भारत की प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाएं भी सहयोग के प्रमुख क्षेत्र बनकर उभर रहे हैं।

इनपुट: IANS

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