भारत में गोल्ड ETF का बाज़ार 1.86 लाख करोड़ रुपये के पार, पर 80% पैसा सिर्फ़ 5 बड़ी स्कीमों में
भारत में सोने में निवेश का एक लोकप्रिय तरीका बन चुके गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF) का बाज़ार लगातार बढ़ रहा है। 30 सितंबर 2024 तक देश की सभी 26 गोल्ड ETF स्कीमों में निवेशकों का कुल पैसा (एसेट…
भारत में सोने में निवेश का एक लोकप्रिय तरीका बन चुके गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF) का बाज़ार लगातार बढ़ रहा है। 30 सितंबर 2024 तक देश की सभी 26 गोल्ड ETF स्कीमों में निवेशकों का कुल पैसा (एसेट अंडर मैनेजमेंट - AUM) बढ़कर 1.86 लाख करोड़ रुपये के पार पहुँच गया है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह आँकड़ा भारतीय निवेशकों के बीच गोल्ड ETF की बढ़ती स्वीकार्यता को दिखाता है, लेकिन यह भी बताता है कि इस बाज़ार में कुछ ही बड़ी कंपनियों का दबदबा है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस सेक्टर की शीर्ष पाँच स्कीमों के पास ही कुल बाज़ार का 80.2 प्रतिशत हिस्सा है। यानी, लगभग 1.49 लाख करोड़ रुपये सिर्फ़ इन पाँच फंड्स में लगे हैं। यह इस बात का संकेत है कि ज़्यादातर निवेशक कुछ चुनिंदा और स्थापित फंड्स पर ही भरोसा करते हैं।
शीर्ष पर कौन सी स्कीमें?
इस सेगमेंट में सबसे बड़ी स्कीम निप्पॉन इंडिया ETF गोल्ड BeES है, जो अकेले 56,982 करोड़ रुपये का प्रबंधन करती है। यह पूरी गोल्ड ETF इंडस्ट्री के कुल AUM का 30.6 प्रतिशत है। इसके बाद दूसरे स्थान पर ICICI प्रूडेंशियल गोल्ड ETF (27,615 करोड़ रुपये), तीसरे पर SBI गोल्ड ETF (26,466 करोड़ रुपये), चौथे पर HDFC गोल्ड ETF (23,900 करोड़ रुपये) और पाँचवें पर कोटक गोल्ड ETF (14,473 करोड़ रुपये) का नाम आता है।
बाज़ार में संपत्ति का यह केंद्रीकरण इतना ज़्यादा है कि शीर्ष तीन स्कीमें ही कुल AUM का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा नियंत्रित करती हैं, जबकि शीर्ष दो के पास ही क़रीब 45 प्रतिशत संपत्ति है।
बाज़ार का केंद्रीकरण और भविष्य
ICRA एनालिटिक्स के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और मार्केट डेटा हेड अश्विनी कुमार ने रिपोर्ट पर टिप्पणी करते हुए कहा, "भारत का गोल्ड ETF मार्केट काफ़ी बढ़ा है, लेकिन एसेट्स का कंसंट्रेशन बना हुआ है। पाँच सबसे बड़ी स्कीमों के पास इस कैटेगरी के कुल AUM का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा है।"
उन्होंने यह भी बताया कि रिटर्न में समानता के बावजूद यह केंद्रीकरण बना हुआ है। कुमार के अनुसार, "अलग-अलग स्कीमों के रिटर्न में काफी समानता है, जिससे पता चलता है कि केवल परफॉरमेंस के अंतर से ही इस कंसंट्रेशन को नहीं समझाया जा सकता।"
हालाँकि बाज़ार में नई स्कीमें भी आई हैं, लेकिन उनकी हिस्सेदारी अभी बहुत कम है। तीन साल से कम के रिटर्न इतिहास वाली 13 नई स्कीमों के पास कुल मिलाकर केवल 14,575 करोड़ रुपये हैं, जो पूरी कैटेगरी के AUM का महज़ 8 प्रतिशत है। अश्विनी कुमार ने कहा, "हालांकि नई स्कीमों के पास एसेट्स का हिस्सा काफी कम है, लेकिन उनके आगे बढ़ने की क्षमता यह बताएगी कि भविष्य में कॉम्पिटिशन कैसे बदलता है।"
इनपुट: IANS



