वैश्विक व्यवस्था और संस्थान आज की चुनौतियों के लिए अपर्याप्त: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मौजूदा वैश्विक व्यवस्था और उसके संस्थानों को आज की बदलती दुनिया के लिए अपर्याप्त बताया है। उन्होंने कहा कि तेजी से बदलती वास्तविकताओं और पुराने पड़ चुके निर्णय लेने वाले…
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मौजूदा वैश्विक व्यवस्था और उसके संस्थानों को आज की बदलती दुनिया के लिए अपर्याप्त बताया है। उन्होंने कहा कि तेजी से बदलती वास्तविकताओं और पुराने पड़ चुके निर्णय लेने वाले तंत्र के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, प्रधानमंत्री नई दिल्ली में आयोजित एनडीटीवी वर्ल्ड समिट को संबोधित कर रहे थे।
प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया इस समय एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है, जिसे 'व्यवस्थाओं के बीच की दुनिया' कहा जा सकता है। इस संदर्भ में उन्होंने दो अहम सवाल उठाए: पहला, वैश्विक व्यवस्था क्यों बदल रही है और पुरानी व्यवस्था आज की चुनौतियों से निपटने में अक्षम क्यों है? और दूसरा, इस बदलते परिदृश्य में भारत की भूमिका क्या होनी चाहिए?
पुरानी व्यवस्था पर सवाल
पीएम मोदी ने कहा कि बदलाव स्वाभाविक और अपरिहार्य है। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के सबक का हवाला देते हुए कहा कि सिर्फ ताकत और स्वार्थ पर आधारित कोई भी व्यवस्था लंबे समय तक नहीं टिक सकती। इसी समझ के आधार पर संयुक्त राष्ट्र की स्थापना संवाद, सहयोग और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान जैसे सिद्धांतों पर की गई थी। हालांकि, उन्होंने कहा कि तब से लेकर आज तक दुनिया में भारी बदलाव आ चुके हैं।
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा, "सवाल यह है कि क्या वैश्विक व्यवस्था इन बदलावों के साथ कदमताल कर पाई है? इसका जवाब है- नहीं।" उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि लोगों की आकांक्षाएं बदल गई हैं, नई आर्थिक शक्तियां उभरी हैं और तकनीक ने समाज व शक्ति की प्रकृति को पूरी तरह बदल दिया है।
नई व्यवस्था में भारत की भूमिका
प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार, जो देश मूल वैश्विक व्यवस्था बनाते समय हाशिये पर थे, वे अब वैश्विक मंच पर अपना सही स्थान मांग रहे हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की ऐतिहासिक भूमिका को स्वीकार किया, लेकिन यह भी कहा कि समकालीन चुनौतियों से निपटने में उनकी सीमाएं अब स्पष्ट हो चुकी हैं।
उनकी टिप्पणियों में वैश्विक संस्थानों में सुधार की भारत की पुरानी मांग की झलक भी मिली। भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि इन संस्थानों को 21वीं सदी की जरूरतों के हिसाब से अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, समावेशी और जवाबदेह बनाया जाना चाहिए, ताकि वे बदलती वैश्विक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर सकें।
इनपुट: IANS



