विदेशी निवेशक भारतीय बाज़ार से क्यों निकाल रहे हैं पैसा? कच्चे तेल की कीमतों से जुड़ा है सीधा कनेक्शन
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों का असर अब भारतीय शेयर बाजार पर साफ दिखने लगा है। बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड का 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने रहना विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) को बिकवाली…
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों का असर अब भारतीय शेयर बाजार पर साफ दिखने लगा है। बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड का 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने रहना विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) को बिकवाली के लिए मजबूर कर रहा है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर महीने में अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी बाजार से 53,337 करोड़ रुपए की भारी-भरकम निकासी की है।
यह लगातार 10वां हफ्ता है जब FPI शुद्ध बिकवाल बने हुए हैं। जियोजित इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के मुख्य निवेश रणनीतिकार डॉ. वी.के. विजयकुमार के अनुसार, "इस साल एक्सचेंजों के जरिए एफपीआई की कुल बिकवाली 3,69,164 करोड़ रुपए रही।" हालांकि, बिकवाली के इस दौर में भी विदेशी निवेशकों ने भारतीय आईपीओ बाजार में रुचि दिखाई है और इस महीने 5,281 करोड़ रुपए का निवेश किया है।
बिकवाली की रफ्तार में कमी के संकेत
बाजार के लिए राहत की एक छोटी सी किरण भी है। 23 अक्टूबर को समाप्त हुए सप्ताह में FPI की बिकवाली की रफ्तार कुछ कम हुई, यहाँ तक कि सप्ताह के दो दिन वे खरीदार भी बने। जानकारों के मुताबिक, इस नरमी के पीछे कुछ अहम वैश्विक और घरेलू कारण हैं। इनमें अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में गिरावट (10-वर्षीय यील्ड का 5.36% से घटकर लगभग 5% पर आना), डॉलर के मुकाबले रुपये का 94.94 पर मजबूत होना और बड़े शेयरों (लार्ज-कैप) का मूल्यांकन आकर्षक स्तर पर आना शामिल है।
छोटे-मझोले शेयरों पर भारी दबाव
इस हफ्ते का एक बड़ा ट्रेंड व्यापक बाजार में आई तेज गिरावट रही। जहाँ प्रमुख सूचकांक निफ्टी 50 केवल 2.35% गिरा, वहीं छोटे और मझोले शेयरों पर इसका असर कहीं ज़्यादा गहरा था। निफ्टी मिड-कैप 100 में 5.6% और निफ्टी स्मॉल-कैप 100 में 7.3% की भारी गिरावट दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि इस गिरावट की एक वजह मार्जिन पर ली गई लॉन्ग पोजीशन की 'जबरन बिक्री' (forced liquidation) हो सकती है।
विश्लेषकों का कहना है कि एक तरफ जहाँ घरेलू संस्थागत निवेशक (DII) बड़े शेयरों में खरीदारी कर बाजार को सहारा दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कच्चे तेल की ऊंची कीमतें अर्थव्यवस्था और बाजार दोनों के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
इनपुट: IANS



