‘पुलिस राज’ का आरोप: शिवसेना (UBT) ने सामना में CJP कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर केंद्र को घेरा
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने अपने मुखपत्र 'सामना' के जरिए केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। शुक्रवार को प्रकाशित एक संपादकीय में पार्टी ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के दो युवा कार्यकर्ताओं की…
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने अपने मुखपत्र 'सामना' के जरिए केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। शुक्रवार को प्रकाशित एक संपादकीय में पार्टी ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के दो युवा कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को लेकर सरकार की कड़ी आलोचना की और उस पर 'गहरी असुरक्षा' से ग्रस्त होकर देश में 'पुलिस राज' कायम करने का आरोप लगाया। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, यह आलोचना सौरव दास और आशुतोष रांका नामक कार्यकर्ताओं को सात दिनों तक हिरासत में रखे जाने के संदर्भ में की गई है।
संपादकीय में सवाल उठाया गया है कि क्या मौजूदा सरकार शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शनों से डरती है या तिरंगा थामे युवाओं को देखकर घबरा जाती है। शिवसेना (यूबीटी) ने मुंबई, दिल्ली, पटना, लखनऊ और कोलकाता जैसे प्रमुख शहरों में सार्वजनिक विरोध के लिए निर्धारित स्थानों पर सरकार द्वारा कब्जा किए जाने की भी निंदा की, इसे लोकतंत्र का गला घोंटना बताया।
न्याय व्यवस्था और असहमति पर सवाल
'सामना' ने न्याय प्रणाली के दोहरे मापदंडों की ओर इशारा करते हुए एक विरोधाभास प्रस्तुत किया। संपादकीय में कहा गया है कि जहां अदालतें तिरंगा थामे आदर्शवादी युवाओं को नसीहत देती हैं, वहीं दुष्कर्म के दोषी पूर्व नेता कुलदीप सेंगर जैसे गंभीर अपराधियों के प्रति नरम रुख अपनाती हैं, जिनकी सजा एक न्यायाधीश ने निलंबित कर दी थी। लेख में प्रशासन पर असहमति को दबाने के लिए पुलिस और अपने समर्थकों का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया।
जंतर-मंतर और विरोध का अधिकार
शिवसेना (यूबीटी) ने बताया कि CJP कार्यकर्ता सौरव दास और आशुतोष रांका को तिहाड़ जेल इसलिए भेजा गया क्योंकि उन्होंने जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन स्थलों की सूची से एकतरफा हटाने के सरकारी आदेश को मानने से इनकार कर दिया था। संपादकीय में कटाक्ष किया गया, "वे युवा जंतर-मंतर पर 'डांडिया' खेलने नहीं गए थे। वे भ्रष्ट चुनावी तौर-तरीकों के खिलाफ अपनी आवाज उठाने गए थे। ...सरकार के अन्याय के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए सरकार से ही अनुमति मांगना बेतुका है।"
पुलिस के इस तर्क को भी खारिज कर दिया गया कि रैलियों में 'अवांछित तत्व' घुस सकते हैं। इसके जवाब में सोनम वांगचुक, विपक्षी सांसदों और अर्थशास्त्री पराकला प्रभाकर जैसे प्रतिष्ठित लोगों के सड़क पर उतरने का हवाला दिया गया। संपादकीय में पूछा गया, "क्या ये लोग भी 'उपद्रवी' हैं?" साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि असली हिंसा सरकार-समर्थित लोगों द्वारा की जाती है।
सरकार की नीति और न्यायपालिका से आग्रह
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी ने इस बात पर भी निराशा जताई कि हाईकोर्ट ने युवा कार्यकर्ताओं को फ्रांस या अल्बानिया के छात्र आंदोलनों का उदाहरण दिया। 'सामना' के अनुसार, न्यायपालिका को समस्या की जड़ तक जाना चाहिए, न कि केवल ऊपरी लक्षणों को देखना चाहिए। संपादकीय का निष्कर्ष है कि मौजूदा नेतृत्व की नीति स्पष्ट है कि नागरिक न तो सवाल पूछें और न ही जवाबदेही की मांग करें। लेख के अंत में कहा गया कि जब कोई सरकार तिरंगा थामे शांतिप्रिय युवाओं से डरने लगे, तो यह उसकी ताकत नहीं, बल्कि 'राजनीतिक वहम की पराकाष्ठा' को दर्शाता है।
इनपुट: IANS



