मेघालय: शिलांग के पास जंगलों में दिखा 'गंभीर रूप से संकटग्रस्त' चीनी पैंगोलिन, संरक्षण की उम्मीद जगी
वन्यजीव संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण खबर में, मेघालय की राजधानी शिलांग के पास के जंगलों में एक दुर्लभ और 'गंभीर रूप से संकटग्रस्त' चीनी पैंगोलिन को देखा गया है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के…
वन्यजीव संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण खबर में, मेघालय की राजधानी शिलांग के पास के जंगलों में एक दुर्लभ और 'गंभीर रूप से संकटग्रस्त' चीनी पैंगोलिन को देखा गया है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के शोधकर्ताओं द्वारा लगाए गए कैमरा ट्रैप में इस जीव की मौजूदगी दर्ज हुई है, जो इस अध्ययन क्षेत्र में अपनी तरह का पहला मामला है।
यह खोज WII के एक जारी प्रोजेक्ट 'मेघालय में स्तनधारी जीवों के समूहों का आकलन' के तहत हुई है। यह प्रोजेक्ट शिलांग के शहरी इलाके से सटे रियात लाबान और लैतकोर आरक्षित वनों पर केंद्रित है। इन शहरी वनों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, लेकिन वे वन्यजीवों के लिए एक महत्वपूर्ण शरणस्थली साबित हो रहे हैं।
जैव विविधता का खजाना
चीनी पैंगोलिन के अलावा, इन कैमरा ट्रैप में कई अन्य महत्वपूर्ण प्रजातियां भी दर्ज की गईं। इनमें लार्ज इंडियन सिवेट, लेपर्ड कैट, मास्क्ड पाम सिवेट, येलो-थ्रोटेड मार्टेन, इंडियन क्रेस्टेड पोरक्यूपाइन और कालीज तीतर शामिल हैं। WII ने कहा, "चीनी पैंगोलिन जैसी गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजाति का अनेक मांसाहारी और छोटे स्तनधारी जीवों के साथ इन वनों में पाया जाना इस बात का प्रमाण है कि ये वन जैव विविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनका सख्ती से संरक्षण और संरक्षण किया जाना चाहिए।"
अवैध शिकार सबसे बड़ा खतरा
चीनी पैंगोलिन को 2014 से IUCN की रेड लिस्ट में 'गंभीर रूप से संकटग्रस्त' (Critically Endangered) श्रेणी में रखा गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसके मांस और शल्कों (स्केल्स) के लिए बड़े पैमाने पर होने वाला अवैध शिकार इसकी आबादी के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इसके शल्कों का इस्तेमाल पारंपरिक चीनी दवाओं में होता है, हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। एक समय पूर्वोत्तर भारत में इनकी अच्छी आबादी थी, लेकिन शिकार और तस्करी के कारण इनकी संख्या में भारी गिरावट आई है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि कानून सख्त होने के बावजूद, अवैध तस्करी नेटवर्क पर लगाम लगाना एक बड़ी चुनौती है। एक वन अधिकारी ने बताया कि अक्सर पकड़े गए लोग केवल कूरियर होते हैं, जबकि नेटवर्क चलाने वाले मुख्य सरगना कानून की पकड़ से बाहर रहते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि WII द्वारा इस तरह के प्रमाण दर्ज किए जाने से संरक्षण प्रयासों को मजबूती मिलेगी।
इनपुट: IANS



