शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026 · नई दिल्ली
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पाकिस्तानी वकील इमान मजारी और उनके पति को 10 साल की सजा, मानवाधिकार संगठन ने न्याय व्यवस्था पर उठाए सवाल

पाकिस्तान में मानवाधिकार वकील इमान जैनब मजारी-हाजिर और उनके पति हादी अली चट्ठा को 10-10 साल की जेल की सजा सुनाए जाने के बाद देश की न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एक प्रमुख मानवाधिकार…

पाकिस्तानी वकील इमान मजारी और उनके पति को 10 साल की सजा, मानवाधिकार संगठन ने न्याय व्यवस्था पर उठाए सवाल
(फोटो: IANS)

पाकिस्तान में मानवाधिकार वकील इमान जैनब मजारी-हाजिर और उनके पति हादी अली चट्ठा को 10-10 साल की जेल की सजा सुनाए जाने के बाद देश की न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एक प्रमुख मानवाधिकार संगठन बलोच यकजेहती कमेटी (बीवाईसी) ने इस फैसले की कड़ी निंदा करते हुए इसे न्यायपालिका की बेबसी और सैन्य वर्चस्व का स्पष्ट उदाहरण बताया है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, संगठन का मानना है कि यह सज़ा मानवाधिकारों की रक्षा के लिए चल रहे संघर्ष को दबाने का एक प्रयास है।

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इस्लामाबाद की एक आतंकवाद निरोधी अदालत ने गुरुवार को यह फैसला सुनाया था। मामला 2024 में एक क्रिकेट मैच के दौरान सड़क पर लगाए गए बैरिकेड हटाने से जुड़ा था, जिसे सुरक्षा उल्लंघन माना गया। अदालत ने दंपति पर आतंकवाद निरोधक अधिनियम (एटीए), 1997 के तहत 10-10 वर्ष के कारावास के अलावा एक-एक लाख पाकिस्तानी रुपए का जुर्माना भी लगाया। अदालत के आदेशानुसार, सभी सजाएं एक साथ चलेंगी, जिससे कुल जेल अवधि 10 वर्ष रहेगी।

संगठन ने फैसले को बताया 'चेतावनी'

बलोच यकजेहती कमेटी (बीवाईसी) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी एक बयान में कहा, "इमान जैनब मजारी और हादी अली चट्ठा को 10-10 वर्ष की सजा पाकिस्तान की न्यायपालिका की बेबसी, न्याय के अभाव और सैन्य प्रभाव वाली व्यवस्था की हकीकत को दर्शाती है।" संगठन ने इस फैसले को उन सभी आवाजों के लिए एक चेतावनी बताया जो पीड़ितों के पक्ष में बोलती हैं और अन्याय का विरोध करती हैं।

बीवाईसी ने कहा कि इमान मजारी और हादी अली चट्ठा केवल वकील ही नहीं, बल्कि मानवाधिकार कार्यकर्ता भी हैं, जिन्होंने बलोच और पश्तून जैसे उत्पीड़ित समुदायों पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ लगातार आवाज उठाई है। संगठन के मुताबिक, यह विडंबना है कि जो लोग दूसरों को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष करते हैं, वे आज खुद ही राज्य के अन्याय का सामना कर रहे हैं।

न्याय और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल

संगठन ने सवाल उठाया कि क्या उत्पीड़ित समुदायों के साथ खड़ा होना और न्याय के लिए आवाज उठाना अपराध है? बीवाईसी ने कहा, "जब वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगें तो पूरी न्याय व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।" संगठन ने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि जेल की सजा से सच्चाई को खत्म नहीं किया जा सकता।

बीवाईसी ने सभी मानवाधिकार संगठनों, वकील संघों, नागरिक समाज और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से इस मामले का संज्ञान लेने और न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवाज उठाने की अपील की है। संगठन ने इस मामले को देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उत्पीड़ितों के लिए आवाज उठाने के अधिकार से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न बताया है।

इनपुट: IANS

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