शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 · नई दिल्ली
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स्थानीय निकाय आरक्षण: सुप्रीम कोर्ट से झटका लगने के बाद चंद्रबाबू नायडू पर जगन मोहन रेड्डी का हमला

आंध्र प्रदेश में स्थानीय निकाय चुनावों में पिछड़ा वर्ग (बीसी) के लिए 34% आरक्षण देने के राज्य सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को…

स्थानीय निकाय आरक्षण: सुप्रीम कोर्ट से झटका लगने के बाद चंद्रबाबू नायडू पर जगन मोहन रेड्डी का हमला
(फोटो: IANS)

आंध्र प्रदेश में स्थानीय निकाय चुनावों में पिछड़ा वर्ग (बीसी) के लिए 34% आरक्षण देने के राज्य सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को आंध्र प्रदेश सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें स्थानीय निकाय चुनावों में बीसी आरक्षण को 34% तक बढ़ाने वाले सरकारी आदेश को रद्द करने के हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी।

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इस घटनाक्रम के बाद, YSR कांग्रेस पार्टी (YSRCP) के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी ने मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू पर पिछड़ा वर्ग को धोखा देने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि नायडू ने पहले आरक्षण का वादा कर बीसी समुदाय को आकर्षित किया और फिर उनके साथ छल किया, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने उजागर कर दिया है।

जगन मोहन रेड्डी के प्रमुख आरोप

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक पोस्ट में जगन मोहन रेड्डी ने चंद्रबाबू नायडू को 'मिस्टर 420' बताते हुए कहा, "चंद्रबाबू नायडू, लोगों से वादे करने और फिर उन्हें धोखा देने के मामले में आप 'मिस्टर 420' हैं।" उन्होंने आगे कहा, "एक बार फिर आप एक धोखेबाज के रूप में बेनकाब हुए हैं।"

वाईएसआरसीपी प्रमुख ने अपने आरोपों को आगे बढ़ाते हुए कहा, "आपके सुपर सिक्स और सुपर सेवन वादे भी एक और धोखा हैं। हमारी सरकार के दौरान लोगों को मिलने वाली योजनाओं को बंद करना भी धोखा था। विद्या दीवेना और वसति दीवेना योजनाओं के तहत करीब 9,000 करोड़ रुपये का बकाया छोड़ देना भी एक बड़ा विश्वासघात है।" उन्होंने यह भी मांग की कि नायडू को पिछड़ा वर्ग से माफी मांगनी चाहिए।

क्या था अदालती मामला?

यह मामला 18 अगस्त को मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू द्वारा की गई घोषणा से जुड़ा है, जिसमें ग्रामीण स्थानीय निकायों में बीसी वर्ग को 34 प्रतिशत और शहरी स्थानीय निकायों में 33.33 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही गई थी।

हालांकि, 1 अक्टूबर को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने इन दो सरकारी आदेशों को यह कहते हुए निरस्त कर दिया था कि इससे कुल आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक हो जाती है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का हवाला दिया, जिसके अनुसार स्थानीय निकायों में सभी वर्गों को मिलाकर कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। इसी फैसले को राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जहां उसकी याचिका खारिज हो गई।

इनपुट: IANS

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News4Social राजनीति डेस्क

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