गुजरात: गिर के बाद अब बरडा का जंगल बन रहा एशियाई शेरों का दूसरा घर, अध्ययन में हुई पुष्टि
गांधीनगर: कभी सिर्फ गिर के जंगलों तक सीमित माने जाने वाले एशियाई शेरों ने अब अपना नया ठिकाना ढूंढ लिया है। गुजरात के पोरबंदर और देवभूमि द्वारका जिलों में फैला बरडा वन्यजीव अभयारण्य अब इन राजसी जीवों…
गांधीनगर: कभी सिर्फ गिर के जंगलों तक सीमित माने जाने वाले एशियाई शेरों ने अब अपना नया ठिकाना ढूंढ लिया है। गुजरात के पोरबंदर और देवभूमि द्वारका जिलों में फैला बरडा वन्यजीव अभयारण्य अब इन राजसी जीवों के लिए एक स्थायी और सुरक्षित घर के रूप में उभर रहा है। हाल ही में हुए एक वैज्ञानिक अध्ययन ने इस बात की पुष्टि की है कि बरडा का जंगल शेरों के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए पूरी तरह उपयुक्त है।
एक विस्तृत अध्ययन के अनुसार, बरडा में शेरों के लिए पर्याप्त शिकार, रहने के लिए अनुकूल माहौल और पनपने के लिए सभी जरूरी पर्यावरणीय परिस्थितियां मौजूद हैं। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, इस अभयारण्य में लगभग 144 वर्षों के अंतराल के बाद शेरों की प्राकृतिक वापसी हुई है। शुरुआत में एक नर शेर खुद यहां पहुंचा था, जिसके बाद गुजरात वन विभाग ने पांच मादा शेरों को यहां लाकर बसाया।
संरक्षण के प्रयास और वैज्ञानिक अध्ययन
"गिर से आगे: एशियाई शेरों के लिए एक संभावित गढ़ के तौर पर बरडा वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुरी" शीर्षक वाला यह शोध 'पीएलओएस वन' जर्नल में प्रकाशित हुआ है। गुजरात वन विभाग और बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस अध्ययन में शेरों की गतिविधियों, उनके आवास चयन और खान-पान की आदतों का गहराई से विश्लेषण किया गया।
जूनागढ़ वन वृत्त के वन संरक्षक मोहन राम (आईएफएस) ने बताया कि वर्तमान में बरडा में 17 शेर मौजूद हैं। अध्ययन के लिए छह शेरों (एक नर और पांच मादा) को रेडियो-कॉलर पहनाकर जनवरी 2023 से जुलाई 2025 के दौरान उनके 1.69 लाख से अधिक जीपीएस लोकेशन दर्ज किए गए। इससे पता चला कि शेर बरडा के घास के मैदानों का प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहे हैं और अपना सामाजिक दायरा बना रहे हैं।
शिकार का आधार और सरकारी पहल
मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में राज्य सरकार ने बरडा में रहने वाले पशुपालकों के लिए एक पुनर्वास योजना भी घोषित की है, ताकि शेरों के लिए इसे एक सुरक्षित घर बनाया जा सके। वन एवं पर्यावरण मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने इस शोध को संरक्षण की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बताया है।
वन विभाग शेरों के लिए शिकार का आधार (prey base) मजबूत करने पर भी ध्यान केंद्रित कर रहा है। अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) डॉ. जयपाल सिंह के अनुसार, 2025-26 के दौरान गिर अभयारण्य से 441 चीतल बरडा में छोड़े गए थे। साल 2007 से अब तक बड़ी संख्या में चीतल और सांभर को यहां लाकर बसाया गया है।
इको-टूरिज्म को मिला बढ़ावा
बरडा में शेरों की मौजूदगी ने इको-टूरिज्म को भी बढ़ावा दिया है, जिससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं। साल 2024 में यहां इको-टूरिज्म की शुरुआत की गई। जहां पहले साल 2,271 पर्यटक आए थे, वहीं 2025-26 में यह संख्या 48% बढ़कर 3,359 हो गई। इससे स्थानीय निवासियों को नेचर गाइड और सफारी ऑपरेटर के रूप में काम करने का मौका मिला है।
इनपुट: IANS



