Ground Report: डिलिवरी केस बिगड़ने पर आज भी हल्द्वानी ही भागना पड़ता है’, क्या है इस बार अल्मोड़ा सीट का समीकरण

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Ground Report: डिलिवरी केस बिगड़ने पर आज भी हल्द्वानी ही भागना पड़ता है’, क्या है इस बार अल्मोड़ा सीट का समीकरण

अल्मोड़ा: ये उत्तराखंड (Uttarakhand Election) का अल्मोड़ा शहर है। वैसे तो यहां इस बार असली टक्कर कांग्रेस और बीजेपी (BJP vs Congress) में ही है, मगर जब हम शहर के बीचों-बीच स्थित लाला बाजार के एक छोटे से रेस्तरां में पहुंचे तो तीन दोस्तों की बातचीत सुनकर हमें वोटर्स के मन में चल रहे कन्फ्यूजन का पता लगा। यहां हमें बैठे मिले रिटायर्ड फौजी बल्केश्वर सिंह, सरकारी स्कूल में टीचर नवीन चंद्र जोशी और हार्डवेयर के कारोबारी मनमोहन बिष्ट। बातचीत कुछ यूं थी – अरे अभी उस दिन जनरल साहब (वीके सिंह) जी आए थे ना, सुना नहीं था कि क्या कह रहे थे- जो काम 60 साल में नहीं हुआ, मोदी सरकार ने आठ साल में कर दिखाया।

तभी चाय की चुस्की लेते उनके दूसरे साथी बोल पड़े- पिछली बार मोदी सरकार के नाम पर वोट दिया था, लेकिन क्या नतीजा निकला? अल्मोड़ा की पानी की किल्लत दूर हुई? आज भी डिलिवरी केस बिगड़ने पर महिला को हल्द्वानी लेकर ही भागना पड़ता है? पिछले 5 सालों में कुछ भी नहीं बदला। टेबल पर बैठे तीसरे आदमी ने झल्लाकर कहा- तो क्या करें, मोदी की बजाय उस कांग्रेस को वोट दें, जिसका हाईकमान इतना ढीला-ढाला है? इस संवाद से आप समझ सकते हैं कि किस तरह की उधेड़बुन यहां के मतदाताओं के बीच चल रही है।

दो पुराने प्रतिद्वंद्वियों में भिड़ंत :वैसे अगर अल्मोड़ा सीट के चुनावी माहौल की बात करें तो यहां दो दशक बाद पुराने प्रतिद्वंदी फिर आमने-सामने हैं। इस मुकाबले में जहां कांग्रेस ने अपने परंपरागत प्रत्याशी मनोज तिवारी को लगातार पांचवीं बार मैदान में उतारा है तो वहीं बीजेपी ने मौजूदा विधायक और डिप्टी स्पीकर रघुनाथ सिंह चौहान का टिकट काटकर अपने पुराने साथी कैलाश शर्मा पर भरोसा दिखाया है। अल्मोड़ा सीट दो बार कांग्रेस और दो बार बीजेपी के खाते में गई है। तिवारी और शर्मा 2002 और 2007 में भी आपस में टकरा चुके हैं। ये दोनों ही स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार से आते हैं। तिवारी पूर्व सीएम हरीश रावत के करीबी माने जाते हैं।

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हर तरह का वोटर है यहां :
इस सीट पर शहर के अलावा कुछ ग्रामीण इलाके भी आते हैं। करीब 90 हजार मतदाता हैं। यह सीट पिछड़ी जातियों के साथ-साथ सवर्ण बहुल भी है, जिसमें ब्राह्मणों के साथ-साथ ठाकुरों की भी अच्छी खासी आबादी है। वहीं एससी आबादी भी अहम है। इसके अलावा, यहां लगभग सात-आठ हजार आबादी अल्पसंख्यकों की भी है। भीतरखाने चर्चा है कि चुनाव आते-आते कहीं माहौल हिंदू बनाम मुस्लिम न हो जाए। हाल में इंजिनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने वाले युवा समरजीत सिंह खोलिया कहते हैं कि सरकार जब बेरोजगारी और महंगाई जैसे मोर्चे पर कुछ नहीं कर पा रही तो राम मंदिर का चश्मा चढ़ाकर लोगों को भटकाने का खेल खेलने की कोशिश में है।

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‘सर्दियों के मौसम में भी दो-दो दिन बाद आता है पानी’

15वीं शताब्दी में कुमाऊं के चंद वंश के राजाओं की राजधानी रही अल्मोड़ा आगे चलकर कुमाऊं की संस्कृति, धर्म व आध्यात्मिकता का केंद्र बनी। वहीं आज कुमाऊं मंडल की सांस्कृतिक राजधानी कहलाने वाला अल्मोड़ा आजाद भारत में एक से एक दिग्गज हस्तियां, राजनेता, साहित्यकार से लेकर शिक्षाविद तक देने के बावजूद आज तक शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं से जूझ रहा है। पानी की किल्लत बड़ी मुसीबत है। शहर को 16 एमएलडी पानी की जरूरत है, लेकिन उसे रोजाना 8 एमएलडी पानी से काम चलाना पड़ रहा है। शहर के कई इलाकों में सर्दियों के इस मौसम में भी दो-दो दिन बाद पानी आता है। पांडे टोला के बनवारी लाल का कहना था कि सर्दियों में जब पानी का यह हाल है तो गर्मियों में पानी की किल्लत का अंदाजा ही लगा सकते हैं। उस समय अल्मोड़ा में बाहरी टूरिस्ट भी काफी होता है। बुनियादी सुविधाओं और रोजगार की कमी के चलते पिछले काफी सालों से अल्मोड़ा से बड़े पैमाने पर पलायन भी हुआ है। यहां के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक जगदीश जोशी का कहना था कि रोजगार की तलाश में पलायन की समस्या अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ जैसे पहाड़ी इलाकों की एक बड़ी सच्चाई है। कोरोना काल में जो लोग वापस लौटे थे, उनमें से आधे से ज्यादा लोग रोजगार का कोई विकल्प न मिलने पर वापस लौट गए।



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