वैश्विक तनाव और ब्याज दरों की चिंता में सोना-चांदी धड़ाम, जून के बाद गोल्ड का सबसे बुरा हफ्ता
इस सप्ताह सोने और चांदी के निवेशकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितताओं के कारण दोनों कीमती धातुओं की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज…
इस सप्ताह सोने और चांदी के निवेशकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितताओं के कारण दोनों कीमती धातुओं की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई। सोने के लिए यह सप्ताह जून के बाद का सबसे खराब प्रदर्शन वाला रहा, जिसमें इसकी कीमतों में करीब 3.5 प्रतिशत की गिरावट आई। वहीं, चांदी की हालत और भी खराब रही, जिसकी कीमत 7.8 प्रतिशत तक लुढ़क गई और यह नवंबर 2025 के बाद के अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस भारी बिकवाली के पीछे कई बड़े कारण एक साथ काम कर रहे हैं। इनमें पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रखने की आशंका प्रमुख हैं। ऊंची ब्याज दरें सोने के आकर्षण को कम कर देती हैं, क्योंकि सोने में निवेश पर कोई ब्याज नहीं मिलता।
घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों का हाल
इस वैश्विक कमजोरी का सीधा असर भारतीय बाजारों पर भी दिखा। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर सोने का दिसंबर वायदा भाव 1,42,150 रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास आ गया, जो पिछले सत्र से 1,230 रुपये (0.86%) कम है। चांदी में गिरावट और भी बड़ी रही, जहां दिसंबर वायदा का भाव 4,191 रुपये यानी 2.1% गिरकर 1,95,408 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गया। यह 2 लाख रुपये प्रति किलोग्राम के मनोवैज्ञानिक स्तर से काफी नीचे है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी यही रुख रहा। कॉमेक्स पर सोना 1.24% गिरकर 4,010 डॉलर प्रति औंस पर आ गया, जो 20 जुलाई के बाद का सबसे निचला स्तर है। इसी तरह, चांदी भी लगभग 1.9% की गिरावट के साथ 53.96 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रही थी।
गिरावट के पीछे के मुख्य कारण
कच्चा तेल और महंगाई: बाजार विश्लेषकों के अनुसार, कीमतों में गिरावट का सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी है। पश्चिम एशिया में तनाव और हूती हमलों के चलते ब्रेंट क्रूड 116.7 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है। तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा होता है, जिससे केंद्रीय बैंकों पर ब्याज दरें ऊंची बनाए रखने का दबाव बढ़ता है।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व का रुख: हालांकि अक्टूबर की बैठक में फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की उम्मीद कम है, लेकिन दिसंबर में बढ़ोतरी की संभावना 80 प्रतिशत से अधिक बनी हुई है। इसी वजह से निवेशक कीमती धातुओं में नया पैसा लगाने से हिचक रहे हैं। मजबूत डॉलर और ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड भी सोने की मांग पर दबाव डाल रहे हैं।
आगे क्या होगा?
आने वाले दिनों में बाजार की दिशा कई वैश्विक आंकड़ों पर निर्भर करेगी। निवेशकों की नजर अमेरिकी पर्सनल कंजम्प्शन एक्सपेंडिचर (PCE) के आंकड़ों पर रहेगी, जिसे फेडरल रिजर्व महंगाई का अहम पैमाना मानता है। इसके अलावा, यूरोपीय सेंट्रल बैंक की बैठक, चीन से आने वाले आर्थिक आंकड़े और वैश्विक ऊर्जा बाजार के घटनाक्रम भी सोने-चांदी की चाल तय करेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर महंगाई ऊंची बनी रही और केंद्रीय बैंकों का रुख सख्त रहा, तो कीमती धातुओं पर दबाव जारी रह सकता है।
इनपुट: IANS



