ग़रीबी हटाओ; इंदिरा से राहुल तक नाकाम कोशिश?

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गरीबी हटाओ का नारा एक बार फिर से वापस आ गया है. कल राहुल गाँधी ने एक न्यूनतम आय वाली चुनावी स्कीम की घोषणा की. 72,000 रूपये सालाना हर परिवार को उपलब्ध कराना, कांग्रेस पार्टी के साथ-साथ राहुल गाँधी के लिए भी एक बड़ी चुनौती होगी. इतनी खस्ता अर्थव्यस्था के साथ 3,60,000 करोड़ का और बोझ क्या देश की सेहत के लिए अच्छा होगा इस बात की फ़िक्र किसी भी तथाकथित नेता को नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी भी UBI की बात करते हैं, तो राहुल गाँधी उसकी घोषणा ही कर देते हैं, जैसे कोई रेस लगी हो, कौन देश को ज्यादा डुबोयेगा.

वैसे गरीबी हटाओ का नारा कोई नया नहीं है. अभी जल्द ही राजनीति में दाखिल हुईं प्रियंका गाँधी की दादी और भारत की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने ये नारा 60 के दशक में ही दे दिया था. 1969 में जब कांग्रेस जब दो फांक में बंट गयी तो एक धड़े का नेतृत्व इंदिरा कर रही थीं. अब 1971 के चुनाव में इंदिरा गाँधी को सत्ता से हटाने के लिए विपक्षियों ने नारा दिया, ‘इंदिरा हटाओं’. वैसे भी इंदिरा गाँधी को पहले ‘गूंगी गुडिया’ का नाम दिया जा चुका था. अब उस समय की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए इदिरा गाँधी ने बोला, “मेरे विपक्षी कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूँ गरीबी हटाओ”

अब इस नारे का भूत फिर से वापस आ गया है. जिस तरह कल राहुल गाँधी ने ‘न्यूनतम आय योजना’ का वादा किया और सत्ता में आने के बाद इसे लागु करने की घोषणा की, ऐसा लगता है की यह उसी गरीबी हटाओ को नए कलेवर में पेश किया जा रहा है. अभी समय की मांग जैसी है उसी हिसाब से पैकेजिंग करके माल बेचने की कोशिश की जा रही है. पहले भाजपा UBI की बात की फिर कांग्रेस ने, अब राजनीति में वादे कितने पूरे होते हैं, इस बात के साक्षी तो आप है ही.

जितनी घोषणा राजनितिक दलों के द्वारा की जा रही है, और जैसी भारत की अर्थव्यस्था हो गयी है, कलीम आज़िज का एक शेर याद आता है मुझे

दामन पे कोई छींट न ख़ंजर पे कोई दाग़

तुम क़त्ल करे हो कि करामात करो हो