बुधवार, 7 अक्टूबर 2026 · नई दिल्ली
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डॉ. सुभाष चंद्रा गारंटी मामला: LIC हाउसिंग फाइनेंस का कर्ज चुकाने के लिए कंपनियों ने रखा सेटलमेंट का प्रस्ताव

एस्सेल ग्रुप से जुड़ी चार कंपनियों ने LIC हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड से लिए गए अपने कर्जों को चुकाने के लिए एक सेटलमेंट प्रस्ताव पेश किया है। समाचार एजेंसी IANS से मिली जानकारी के अनुसार, इन कंपनियों ने…

डॉ. सुभाष चंद्रा गारंटी मामला: LIC हाउसिंग फाइनेंस का कर्ज चुकाने के लिए कंपनियों ने रखा सेटलमेंट का प्रस्ताव
(फोटो: IANS)

एस्सेल ग्रुप से जुड़ी चार कंपनियों ने LIC हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड से लिए गए अपने कर्जों को चुकाने के लिए एक सेटलमेंट प्रस्ताव पेश किया है। समाचार एजेंसी IANS से मिली जानकारी के अनुसार, इन कंपनियों ने 100 प्रतिशत मूलधन के साथ 10 प्रतिशत ब्याज चुकाने की पेशकश की है। यह मामला उद्योगपति डॉ. सुभाष चंद्रा द्वारा दी गई पर्सनल गारंटी से जुड़ा है, जिन्होंने पहले भी स्पष्ट किया था कि यह उनका व्यक्तिगत कर्ज नहीं, बल्कि कंपनियों द्वारा लिया गया लोन है, जिसके लिए वे सिर्फ गारंटर थे।

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बुधवार को सूत्रों द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, जिन कंपनियों ने यह प्रस्ताव दिया है, वे अपना पूरा बकाया ब्याज सहित चुकाने पर सहमत हो गई हैं। डॉ. चंद्रा इन्हीं कंपनियों के लिए व्यक्तिगत गारंटर की भूमिका में थे।

किन कंपनियों पर कितना कर्ज?

इस मामले में कुल चार कंपनियां शामिल हैं जिन्होंने LIC हाउसिंग फाइनेंस से कर्ज लिया था। इनमें वसंत सागर प्रॉपर्टीज लिमिटेड और पैन इंडिया इंफ्राप्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड पर संयुक्त रूप से 500 करोड़ रुपए का कर्ज है। वहीं, डिजिटल सब्सक्राइबर मैनेजमेंट एंड कंसल्टेंसी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड और स्प्रिट इंफ्रापावर प्रोजेक्ट ने 480 करोड़ रुपए का लोन लिया था। अब इन चारों कंपनियों ने अपना पूरा बकाया चुकाने की पेशकश की है।

गारंटी और व्यक्तिगत कर्ज पर विवाद

यह मामला तब चर्चा में आया था जब नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में लोन में 99.97% की भारी कटौती (हेयरकट) को डॉ. चंद्रा की व्यक्तिगत कर्जमाफी के रूप में पेश किया गया था। इस पर डॉ. चंद्रा ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा था कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से कोई पैसा उधार नहीं लिया था। उन्होंने स्पष्ट किया था कि 22,006 करोड़ रुपए का जो आंकड़ा पेश किया गया, वह कार्यवाही में दायर कुल क्लेम था, जिसे उनका व्यक्तिगत बकाया नहीं माना जाना चाहिए। उनके अनुसार, यह सिर्फ उन कंपनियों के कर्ज के लिए दी गई गारंटी थी।

इनपुट: IANS

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