क्या देश को एक ‘फुल टाइम’ प्रधानमंत्री की ज़रूरत है?

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भारतीय विंग कमांडर ‘अभिनंदन’ वापस आ चुके है, बार्डर पर उनका स्वागत काफी जोर शोर से किया गया. सवाल यह है कि क्या भारत को एक ‘फुल टाइम’ प्रधानमंत्री की ज़रूरत है? यह सवाल आज के राजनीतिक परिस्थितियो को देखकर दिमाग मे उठाना लाजमी है. कश्मीर बार्डर पर तनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘मेरा बूथ सबसे मजबूत’ नाम की ऐसी विडियो कांफ्रेंस का संबोधन करते हुए दिखे, जो कि विश्व की सबसे बड़ी ‘विडियो कांफ्रेंस’ थी. इसका प्रसारण लगभग 15 हजार जगहों पर किया गया.

क्या इतनी जटिल परिस्थितियों के बावजूद ‘चुनाव प्रचार’ आवश्यक था?

जिस तरह की परिस्थितियां कश्मीर सीमा पर थी, उसके बावजूद प्रधानमंत्री पहले ‘चुरू’ और उसके बाद ‘कन्याकुमारी’ मे सभाओं को संबोधित करते नजर आये. गौरतलब है कि जब प्रधानमंत्री इन सभाओं को संबोधित कर रहे थे, उस वक़्त दिल्ली और मुंबई जैसे शहरो मे ‘रेड अलर्ट’ का माहौल था. सीमा के इलाको मे हवाईअड्डो को बंद कर दिया गया था, और हवाई युद्ध शुरू होने के आसार नजर आने लगे थे. सवाल पूछना आपका ‘हक़’ है, और सवाल यह है कि ऐसे नाज़ुक हालात मे ‘चुनाव प्रचार’ के लिए रैलियां करना, क्या हमारे देश के प्रधानमंत्री के लिए उचित था ? क्या ‘चुनाव अभियान’ की जगह ‘देश’ ज्यादा महत्वपूर्ण नही है ?

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