दवाओं के दाम में बड़ा खेल? नामी अस्पतालों और कंपनियों पर करोड़ों के गठजोड़ का आरोप
दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) के पीछे एक बड़े गठजोड़ का पर्दाफाश हुआ है, जिसमें दवा कंपनियों, कॉर्पोरेट अस्पतालों और डॉक्टरों की मिलीभगत से मरीजों से करोड़ों रुपये वसूले जाने का आरोप लगा है…
दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) के पीछे एक बड़े गठजोड़ का पर्दाफाश हुआ है, जिसमें दवा कंपनियों, कॉर्पोरेट अस्पतालों और डॉक्टरों की मिलीभगत से मरीजों से करोड़ों रुपये वसूले जाने का आरोप लगा है। गुजरात केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स एसोसिएशन के प्रमुख जसवंत पटेल ने दावा किया है कि कैंसर और दिल की बीमारियों जैसी गंभीर स्थितियों में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की लागत बहुत कम होती है, लेकिन उनकी MRP कई गुना ज़्यादा रखी जाती है।
समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, पटेल ने बताया कि इस पूरे तंत्र में सबसे ज़्यादा फायदा बड़ी हॉस्पिटल चेन और चेन स्टोर्स को पहुंचाया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया, “हमारा मार्जिन फिक्स है, एक छोटे व्यापारी को 2 फीसदी ज्यादा देने में भी कंपनी को दिक्कत होती है, लेकिन चेन स्टोर्स और कॉर्पोरेट हॉस्पिटलों को 30 से 50 प्रतिशत तक एक्स्ट्रा मार्जिन दिया जाता है।”
कैसे काम करता है यह ‘गठजोड़’?
जसवंत पटेल के मुताबिक, यह खेल दवाओं के स्टॉकिस्ट मूल्य (PTS) और MRP के बीच भारी अंतर पर टिका है। उन्होंने कहा कि कैंसर या इमरजेंसी इंजेक्शन जैसी दवाएं आम केमिस्ट की दुकानों पर नहीं बिकतीं। इन्हें सीधे अस्पतालों और डॉक्टरों से जुड़े खास डिस्ट्रीब्यूटरों के ज़रिए बेचा जाता है। उन्होंने दावा किया कि कोरोना काल में इस्तेमाल हुई कई एंटीबायोटिक दवाओं के साथ भी ऐसा ही हुआ।
पटेल ने कहा, “पूरे हिंदुस्तान में करीब 200 ऐसे डिस्ट्रीब्यूटर हैं, जो स्पेशियलिटी प्रोडक्ट में डील करते हैं और सीधे डॉक्टरों से जुड़े हैं। डॉक्टरों के अपने मेडिकल स्टोर्स हैं, जहां उनके रिश्तेदार बैठे हैं, और अस्पतालों के अंदर जो स्टोर्स हैं, वहां भी यही धंधा चल रहा है।” उनके अनुसार, MRP के दायरे में रहते हुए ही यह ‘लूट’ हो रही है, जिस पर कोई स्पष्ट कानून नहीं है।
सरकारी नियंत्रण और समाधान की मांग
पटेल ने इस मामले में सीबीआई जांच की मांग की है, जिससे अपोलो जैसे बड़े कॉर्पोरेट हॉस्पिटल चेन का ‘नेक्सस’ सामने आ सके। उन्होंने दवाओं की कीमत तय करने वाली संस्था, नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) से हस्तक्षेप की अपील की है।
उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को एक कानून बनाकर स्टॉकिस्ट मूल्य (PTS), रिटेलर मूल्य (PTR) और MRP के बीच के भारी अंतर को खत्म करना चाहिए। पटेल ने कहा, “नियम के मुताबिक रिटेल मार्जिन 20 प्रतिशत और होलसेल मार्जिन 10 प्रतिशत है, लेकिन हकीकत में 27 रुपये की एमआरपी वाली दवा 27,000 रुपये में बिक रही है।” उन्होंने बताया कि इससे मध्यम और गरीब वर्ग के लोगों को इलाज के लिए अपनी जमीन-जायदाद तक बेचनी पड़ रही है।
इनपुट: IANS



