गुरूवार, 5 नवम्बर 2026 · नई दिल्ली
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कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट, अमेरिकी चुनाव और ईरान पर नरम रुख़ बने बड़ी वजह

गुरुवार को लगातार चौथे दिन वैश्विक बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिली। ब्रेंट क्रूड का भाव 94 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गया, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड भी 87 डॉलर के स्तर से…

कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट, अमेरिकी चुनाव और ईरान पर नरम रुख़ बने बड़ी वजह
(फोटो: IANS)

गुरुवार को लगातार चौथे दिन वैश्विक बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिली। ब्रेंट क्रूड का भाव 94 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गया, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड भी 87 डॉलर के स्तर से नीचे फिसल गया। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस गिरावट के पीछे मुख्य रूप से दो कारण हैं — पहला, अमेरिकी मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत और दूसरा, ईरान के साथ तनाव कम होने की बढ़ती उम्मीदें।

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यह लगातार चौथा कारोबारी सत्र था जब तेल बाज़ार लाल निशान में बंद हुआ। बुधवार को ही दोनों बेंचमार्क (ब्रेंट और WTI) 8 प्रतिशत से ज़्यादा टूटे थे, जो अगस्त के अंत के बाद का सबसे निचला स्तर था। कुल मिलाकर इस हफ़्ते कच्चे तेल की कीमतें लगभग 16 प्रतिशत तक गिर चुकी हैं, जिसे हाल के वर्षों की सबसे तेज़ साप्ताहिक गिरावटों में से एक माना जा रहा है। गुरुवार को ब्रेंट क्रूड क़रीब 1% गिरकर 93.65 डॉलर प्रति बैरल पर, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड 1.36% टूटकर 86.92 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।

ईरान पर तनाव घटने की उम्मीद क्यों?

बाज़ार के निवेशकों का मानना है कि अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी की बढ़त के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए ईरान के ख़िलाफ़ कोई आक्रामक सैन्य कार्रवाई करना मुश्किल हो सकता है। इसी वजह से पश्चिम एशिया से जुड़े भू-राजनीतिक जोखिम का असर कम हुआ है और कूटनीतिक समाधान की उम्मीद बढ़ी है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, खाड़ी देशों के सरकारी सूत्रों का भी मानना है कि ईरान पर बड़े सैन्य हमले की आशंका अब कम हो गई है। खुद राष्ट्रपति ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि अमेरिका की ओर से तत्काल हमले की कोई योजना नहीं है। इसके अलावा, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी युद्ध की ज़रूरत पर सवाल उठाए हैं, जिससे बाज़ार में बिकवाली को और बढ़ावा मिला।

बाज़ार में तेल की सप्लाई बढ़ी

कीमतों में गिरावट की एक और वजह तेल की आपूर्ति में सुधार होना है। होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की सप्लाई लगभग युद्ध से पहले के स्तर पर पहुँच गई है। इससे बाज़ार में सप्लाई की चिंताएँ कम हुई हैं। एक बैंक के अनुमान के अनुसार, वैश्विक तेल बाज़ार अब फिर से अतिरिक्त आपूर्ति (सरप्लस) की स्थिति में है। सितंबर में बाज़ार में रोज़ाना क़रीब 11 लाख बैरल और अक्टूबर में 14 लाख बैरल अतिरिक्त तेल की सप्लाई रही।

क्या यह गिरावट स्थायी है?

हालांकि, ऊर्जा विशेषज्ञ इस गिरावट को स्थायी मानने में जल्दबाज़ी के ख़िलाफ़ हैं। उनका तर्क है कि भू-राजनीतिक हालात तेज़ी से बदल सकते हैं और अमेरिकी कांग्रेस की नई संरचना जनवरी से ही प्रभावी होगी, इसलिए नीतियों में तुरंत बदलाव की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। इसके अलावा, प्रमुख उपभोक्ता देशों में वाणिज्यिक तेल भंडार पिछले 15 सालों के सबसे निचले स्तर के क़रीब हैं। अमेरिका में भी पिछले हफ़्ते कच्चे तेल, पेट्रोल और डिस्टिलेट का भंडार घटा है, जबकि माँग एक साल के उच्चतम स्तर पर है। इन वजहों से यह कहना मुश्किल है कि कीमतों में गिरावट लंबे समय तक बनी रहेगी।

इनपुट: IANS

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