यूपी पुलिस की लापरवाही: 6 साल जेल में बंद निर्दोष को 6 लाख मुआवजा देने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में उत्तर प्रदेश सरकार को एक व्यक्ति को 6 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है, जिसे अपहरण और हत्या के एक मामले में लगभग छह साल जेल में बिताने के बाद बरी कर दिया…
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में उत्तर प्रदेश सरकार को एक व्यक्ति को 6 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है, जिसे अपहरण और हत्या के एक मामले में लगभग छह साल जेल में बिताने के बाद बरी कर दिया गया। अदालत ने यूपी पुलिस की जांच प्रक्रिया पर बेहद सख्त नाराजगी जाहिर की है।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन का एक गंभीर उदाहरण माना। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने कहा कि एक मनगढ़ंत कहानी और सिर्फ शक के आधार पर एक व्यक्ति के जीवन के छह कीमती साल बर्बाद हो गए, जबकि मामले में बुनियादी जांच तक नहीं की गई थी।
पुलिस जांच पर गंभीर सवाल
यह मामला आगरा जिले में अक्टूबर 2019 में दर्ज अपहरण और हत्या के एक प्रकरण से जुड़ा है। याचिकाकर्ता को 14 नवंबर 2019 को गिरफ्तार किया गया था। हैरानी की बात यह है कि उसका नाम न तो मूल FIR में था और न ही शिकायतकर्ता के शुरुआती बयान में उसका जिक्र था। पुलिस ने बाद में एक अस्पष्ट सीसीटीवी फुटेज और एक सह-आरोपी के कथित कबूलनामे के आधार पर उसे आरोपी बनाया था।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि पुलिस भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी के तहत इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को स्वीकार्य बनाने के लिए जरूरी प्रमाणपत्र भी पेश नहीं कर सकी। इसी कमजोर जांच के आधार पर व्यक्ति को वर्षों तक न्यायिक हिरासत में रहना पड़ा।
निचली अदालत से सुप्रीम कोर्ट तक का सफर
आरोपी की लंबी कैद को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल मार्च 2026 में ट्रायल कोर्ट को तीन महीने के भीतर सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया था। इसके बाद, सबूतों के अभाव में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले की प्रति मंगवाकर पूरी जांच प्रक्रिया की समीक्षा की, जिसके बाद यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया।
न्याय सुनिश्चित करना पुलिस का दायित्व
न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन ने टिप्पणी करते हुए कहा कि लापरवाही भरी जांच और कमजोर अभियोजन की वजह से एक व्यक्ति को छह साल जेल में काटने पड़े। पीठ ने स्पष्ट किया कि पुलिस का काम किसी भी कीमत पर आरोपी को दोषी साबित करना नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच के जरिए न्याय सुनिश्चित करना है।
मुआवजे और प्रशिक्षण के निर्देश
अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को एक महीने के भीतर पीड़ित व्यक्ति को 6 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। साथ ही यह भी कहा है कि अगर समय पर भुगतान नहीं हुआ तो बकाया राशि पर 18 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा। इसके अलावा, कोर्ट ने अपने आदेश की एक प्रति राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) और गृह सचिव को भेजने का निर्देश दिया है, ताकि पुलिस अधिकारियों को निष्पक्ष जांच के लिए प्रशिक्षित किया जा सके।
इनपुट: IANS



