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लिथियम-निकेल प्रोसेसिंग में आत्मनिर्भरता की ओर भारत, कैबिनेट ने दी 2,814 करोड़ रुपये की योजना को हरी झंडी

भारत अब लिथियम और निकेल जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण खनिजों की प्रोसेसिंग देश में ही करने की तैयारी कर रहा है। आयात पर निर्भरता घटाने और सप्लाई चेन को मजबूत करने के मकसद से प्रधानमंत्री नरेंद्र…

लिथियम-निकेल प्रोसेसिंग में आत्मनिर्भरता की ओर भारत, कैबिनेट ने दी 2,814 करोड़ रुपये की योजना को हरी झंडी
(फोटो: IANS)

भारत अब लिथियम और निकेल जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण खनिजों की प्रोसेसिंग देश में ही करने की तैयारी कर रहा है। आयात पर निर्भरता घटाने और सप्लाई चेन को मजबूत करने के मकसद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 'कैपेक्स सपोर्ट स्कीम टू प्रमोट क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग' को मंजूरी दे दी है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, इस योजना पर अगले पांच वर्षों में 2,814 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।

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इस पहल का मुख्य उद्देश्य लिथियम और निकेल के अयस्कों को देश में ही उच्च शुद्धता वाले रसायनों में बदलना है। वर्तमान में भारत इन प्रोसेस्ड खनिजों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है, जिससे सप्लाई चेन भू-राजनीतिक तनावों और कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील रहती है। सरकार का मानना है कि घरेलू प्रोसेसिंग क्षमता विकसित करना देश की आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है।

क्या है इस योजना का खाका?

इस स्कीम के तहत देश में चार बड़े खनिज प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित करने की योजना है। इनमें से दो प्लांट लिथियम की प्रोसेसिंग के लिए होंगे, जिनकी न्यूनतम क्षमता 30 किलो टन होगी। वहीं, बाकी दो प्लांट निकेल की प्रोसेसिंग करेंगे, जिनकी क्षमता कम से कम 50 किलो टन होगी। एक आधिकारिक बयान में यह भी बताया गया है कि निकेल प्रोसेसिंग के दौरान सह-उत्पाद (by-product) के रूप में कोबाल्ट का भी उत्पादन होगा।

सरकार कैसे देगी वित्तीय सहायता?

इस योजना के तहत सरकार पात्र निवेश पर 30% तक की पूंजीगत सब्सिडी (capital subsidy) देगी। लिथियम से जुड़ी परियोजनाओं के लिए अधिकतम 500 करोड़ रुपये तक की सहायता का प्रावधान है, जबकि निकेल परियोजनाओं के लिए यह सीमा 900 करोड़ रुपये तक रखी गई है। लाभार्थियों का चयन दो चरणों वाली प्रक्रिया के माध्यम से होगा, जिसमें पहले तकनीकी योग्यता और फिर वित्तीय बोली का आकलन किया जाएगा। सबसे कम पूंजीगत सहायता की मांग करने वाले योग्य आवेदकों को प्राथमिकता दी जाएगी। प्रोत्साहन राशि का भुगतान परियोजना के पूरा होने के अलग-अलग चरणों के आधार पर तीन किस्तों में किया जाएगा।

किन क्षेत्रों को मिलेगा फायदा?

सरकार का मानना है कि इस योजना से इलेक्ट्रिक वाहन (EV), बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS), इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा विनिर्माण और स्पेशियलिटी स्टील जैसे क्षेत्रों को सीधा लाभ मिलेगा। ये सभी सेक्टर फिलहाल आयातित कच्चे माल पर बहुत अधिक निर्भर हैं। देश में लिथियम और निकेल प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ने से न केवल बैटरी निर्माण उद्योग मजबूत होगा, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में लागत भी घटेगी। यह पहल 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान के लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

इनपुट: IANS

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