पश्चिम एशिया में गहराते संकट का असर: कच्चा तेल 5 महीने के शिखर पर, 110 डॉलर के करीब पहुंचा ब्रेंट क्रूड
पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक बार फिर उबाल आ गया है। ईरान से जुड़े जोखिम और आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं के बीच अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की…
पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक बार फिर उबाल आ गया है। ईरान से जुड़े जोखिम और आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं के बीच अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमतें लगभग पांच महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल के करीब कारोबार कर रहा है, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी 104 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है।
बाजार में इस तेजी का मुख्य कारण निवेशकों और व्यापारियों की बढ़ती चिंता है, जिन्हें वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर खतरा मंडराता दिख रहा है। यह चिंता तब और बढ़ गई जब ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर कड़ा रुख अपनाया।
क्यों अहम है होर्मुज जलडमरूमध्य?
यह जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों में से एक है, और यहां किसी भी तरह की अस्थिरता का सीधा असर वैश्विक तेल सप्लाई पर पड़ता है। ईरान के प्रथम उपराष्ट्रपति मोहम्मद रजा अरेफ ने हाल ही में कहा, "देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ईरान के पास होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण स्थापित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।" उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान अपने मित्र देशों के लिए सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित कर सकता है, लेकिन मौजूदा हालात के लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि उसे इसकी "कीमत चुकानी होगी।"
बढ़ते क्षेत्रीय संघर्ष का असर
तेल बाजार में तेजी का एक और बड़ा कारण यमन और सऊदी अरब में बढ़ती असुरक्षा है। रिपोर्टों के मुताबिक, हूती विद्रोहियों ने यमन के एक सैन्य प्रशिक्षण शिविर पर हमला किया है। इसके अलावा, सऊदी अरब की ऊर्जा, हवाई अड्डा और सैन्य प्रतिष्ठानों को भी निशाना बनाया गया है। इन घटनाओं से यह डर बढ़ गया है कि अगर यह संघर्ष और फैला तो ऊर्जा आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हो सकती है, जिससे कीमतों में और उछाल आएगा।
भारत के लिए क्या हैं मायने?
भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का सीधा असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। यदि कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो देश में ईंधन लागत, माल ढुलाई का खर्च और समग्र महंगाई बढ़ने का दबाव बन सकता है।
आपूर्ति को लेकर कुछ राहत के संकेत भी
इन चिंताओं के बीच कुछ सकारात्मक खबरें भी हैं। अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र से कच्चे तेल की आपूर्ति युद्ध-पूर्व स्तर के लगभग 80% तक वापस आ गई है। हालांकि, रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति अभी सामान्य नहीं हुई है। वहीं, इराक के तेल मंत्री ने बताया कि उनके देश का तेल निर्यात इस महीने 34 लाख बैरल प्रतिदिन से अधिक हो गया है, जो युद्ध से पहले के स्तर के काफी करीब है। इराक ने आकर्षक छूट देकर अपना निर्यात बढ़ाया है।
इनपुट: IANS



