भारतीय संस्कृति में ‘नास्तिकता’ स्वीकृत है

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भारतीय संस्कृति की परंपरा में एक ऐसा सम्प्रदाय भी है जो नास्तिकता को स्वीकृति प्रदान करता है. हम आम तौर पर मानते हैं की नास्तिकता पश्चिमी सभ्यता की देन है लेकिन भारतीय संस्कृति के इतिहास में पीछे जा कर देखनें पर हमें एक ऐसा सम्प्रदाय मिलता जिसका नाम ‘चार्वाक’ है, चार्वाक दर्शन के प्रणेता ‘गुरु वृहस्पति’ को माना जाता है. गुरु वृहस्पति वैसे तो देवताओं के गुरु थे लेकिन असुरो के सर्वनाश के लिए इन्होने चार्वाक जीवन पद्धति का प्रतिपादन किया.

उधार मांग कर घी पियो

चार्वाक दर्शन को माननें वालो का कहना है कि इस ज़िन्दगी में क्या होने वाला है हमें नहीं पता तो फिर अगले जन्म के बारे में सोच कर क्या करना है. जितनें भी मज़े करने है वो इस जन्म में ही ले लो और अगर मज़े करनें के लिए उधार भी लेना पड़े तो संकोच नहीं करना चाहिए.

जो दिखता है बस वही सत्य है बाकी सब मिथ्या है

चार्वाक दर्शन को माननें वालो ने सिर्फ देखी हुई चीज़ों पर विश्वास करना स्वीकार किया है, बाकी सारे ज्ञान अगर वह आंख के सामनें घटित नहीं हो रहे है तो गलत है. चार्वाक ने वेद-पुराण, धार्मिक ग्रंथों का एक सिरे से खंडन किया है. इन्होनें ‘प्रत्यक्षम एव प्रमाणं’ की उक्ति का प्रतिपादन भी किया है.