CJP प्रवक्ता आशुतोष रांका और सौरव दास केस: SEM कोर्ट ने सुनवाई पूरी की, फैसला सुरक्षित
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रवक्ता आशुतोष रांका और सौरव दास से जुड़े मामले में विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) की अदालत में सुनवाई पूरी हो गई है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने…
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रवक्ता आशुतोष रांका और सौरव दास से जुड़े मामले में विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) की अदालत में सुनवाई पूरी हो गई है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है और जल्द ही इस पर निर्णय सुनाए जाने की उम्मीद है। दिल्ली पुलिस ने दोनों की न्यायिक हिरासत तीन दिन और बढ़ाने की मांग की है।
यह पूरा मामला 13 अक्टूबर से शुरू हुआ था, जब दिल्ली पुलिस ने दास और रांका को जंतर-मंतर पर बैरिकेड फांदने के आरोप में हिरासत में लिया था। अगले दिन, 14 अक्टूबर को, उन्हें पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। इसके बाद 19 अक्टूबर को उनकी हिरासत दो दिन और बढ़ा दी गई थी।
न्यायिक हिरासत को हाईकोर्ट में चुनौती
SEM कोर्ट द्वारा 21 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के आदेश के खिलाफ दोनों प्रवक्ताओं ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था। हालांकि, बुधवार को उन्होंने हाईकोर्ट से अपनी याचिका वापस ले ली। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने बताया कि सौरव दास 27 साल के हैं और आशुतोष रांका 31 साल के हैं। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की, "तो ये जेन-जी नहीं हैं," और 'मिलेनियल्स' व 'जेन-जी' की आयु-सीमा के बारे में भी पूछा।
याचिका वापस लेने से पहले हाईकोर्ट ने शांति भंग की आशंका पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा कि जब शांति भंग होने का खतरा हो तो यह बात अहम हो जाती है कि आप कौन हैं, क्या करते हैं और आपकी मंशा क्या है। अदालत ने कहा, "विरोध करने का अधिकार है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन जब मजिस्ट्रेट शांति भंग होने की आशंका पर विचार करता है तो ये सभी सवाल महत्वपूर्ण हो जाते हैं।"
प्रदर्शन के बदलते उद्देश्य पर कोर्ट की टिप्पणी
दिल्ली हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अगर कोई समूह बार-बार अलग-अलग मुद्दों पर प्रदर्शन करता है तो उनके प्रदर्शन का असली उद्देश्य जानना महत्वपूर्ण हो जाता है। कोर्ट के अनुसार, प्रदर्शनकारी वही हैं, लेकिन उनकी मांगें और प्रदर्शन का मकसद बदल गया है, इसलिए उनकी पहचान और संगठन का असली मकसद जानना भी जरूरी हो जाता है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह इन मुद्दों पर सुनवाई नहीं कर रहा था, बल्कि उसके सामने केवल बॉन्ड देने की शर्त की वैधता का सीमित सवाल था। इन्हीं टिप्पणियों के बाद रांका और दास के वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जो उन्हें दे दी गई।
इनपुट: IANS



