पवन के. वर्मा का कॉलम: हमारे देश में ‘ग्रॉस डोमेस्टिक हैप्पीनेस’ भी कुछ कम नहीं

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पवन के. वर्मा का कॉलम:  हमारे देश में ‘ग्रॉस डोमेस्टिक हैप्पीनेस’ भी कुछ कम नहीं

पवन के. वर्मा का कॉलम: हमारे देश में ‘ग्रॉस डोमेस्टिक हैप्पीनेस’ भी कुछ कम नहीं

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14 मिनट पहले

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पवन के. वर्मा पूर्व राज्यसभा सांसद व राजनयिक

भूटान- जहां मैंने राजदूत के रूप में सेवाएं दी हैं- को जीडीपी के बजाय ‘जीडीएच’ (ग्रॉस डोमेस्टिक हैप्पीनेस) शब्द रचने का श्रेय दिया जाता है। हिमालय की गोद में बसे इस सुंदर देश में जीडीएच वास्तव में ऊंचा है। लेकिन भारत में भी यह कम नहीं। यह एक ऐसी वास्तविकता है, जिसे समाजशास्त्री और आगंतुक स्पष्ट देख सकते हैं।

भला ऐसा कैसे सम्भव है कि एक देश- जहां आमजन प्रतिदिन भयावह चुनौतियों से जूझते हैं- वह इतनी अदम्य प्रसन्नता भी बिखेरता है? यह कैसे सम्भव है कि तंगहाली से भरी गलियों में भी हंसी-ठट्ठे की आवाजें सुनाई देती हैं, सीमित साधनों वाले घरों में भी ​अतिथि-सत्कार बिना किसी कंजूसी के होता है; और असफलताओं के बावजूद निराशा शायद ही कभी हावी होती है?

भारत के ‘हैप्पीनेस ​कोशेंट’ (प्रसन्नता-सूचकांक) को समझने के लिए हमें आमदनी और बुनियादी ढांचे जैसे मानकों से आगे बढ़कर हमारी सभ्यतागत चेतना के ताने-बाने में प्रवेश करना होगा। भारतीय-संतोष के केंद्र में परिवार नामक संस्था है। संयुक्त परिवार व्यवस्था भले ही शहरी भारत में क्षीण हो रही हो, लेकिन वह अब भी एक केंद्रीय संस्था बनी हुई है।

एक बच्चा यहां किसी पृथक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि रिश्तों के एक जीवंत तारामण्डल- दादा-दादी, चचेरे-ममेरे भाई-बहन, चाचा-चाची, मामा-मामी आदि के बीच बड़ा होता है। इनमें से हर कोई उसे स्नेह, अनुशासन और निरंतरता देता है। विपत्ति के समय रिश्तों का यही संजाल भावनात्मक-सांत्वना का काम करता है। यहां व्यक्ति अकेले नहीं गिरता; उसे थाम लिया जाता है।

यही भाव समुदाय तक विस्तृत होता है, जहां सामाजिक जीवन शायद ही कभी विखंडित होता है। पश्चिम में अकेलेपन को महामारी कहा गया है। लेकिन भारत में एकांत ऐसा विलास है, जो बहुत कम लोगों को उपलब्ध है- और बहुतों को इसकी चाह भी नहीं होती। हमारा कैलेंडर भी संस्थागत आनंद की मास्टरक्लास ही समझिए।

होली के उच्छृंखल रंगों से लेकर दिवाली की आलोकमय रात्रियों तक, पोंगल के फसल-उत्सव से लेकर ईद-उल-फितर के सामुदायिक भोज तक- पूरा वर्ष इस स्मरण से भरा रहता है कि जीवन को साथ मिलकर उत्सव की तरह जीना चाहिए। यहां तक कि जन्म, उपनयन, विवाह आदि संस्कार भी हमारे यहां सामूहिक सहभागिता के अवसर बन जाते हैं। छोटे-छोटे सुखों के लिए भी भारतीय प्रतिभा देखते ही बनती है।

सड़क किनारे की दुकान पर शाम की चाय; क्रिकेट पर होने वाली जीवंत बहसें; भीड़भरी ट्रेनों या चॉलों में अचानक फूट पड़ने वाली हंसी; परिवार के साथ किसी प्रिय टीवी धारावाहिक को देखने का अनुष्ठान- ये सब साधारण, मितव्ययी, किंतु गहरे संतोष देने वाली आत्मीयता के संस्कार हैं। इसका एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारण हमारे जीवन में आशा का अस्तित्व भी है। राजमार्गों पर चलने वाले ट्रकों तक पर अकसर ऐसी पंक्तियां लिखी मिल जाती हैं : ‘मिलेगा मुकद्दर’।

यह भावना कि अचानक कहीं से कोई ईश्वरीय वरदान मिल सकता है, किसी गुरु का आशीर्वाद असर कर सकता है, कोई धार्मिक दान फल दे सकता है या कोई अनुष्ठान चमत्कार कर सकता है- भारतीय मन से कभी विलुप्त नहीं होती। ‘किस्मत का करवट लेना’ या ‘भाग्य का बदलना’ यहां केवल प्रचलित मुहावरे ही नहीं, आस्था के विषय भी हैं। हिंदू मिथकों में झोपड़ियों के महलों में बदल जाने और साधारण धातुओं के सोना बन जाने की कथाएं भरी पड़ी हैं।

मुझे अपने बुजुर्गों की कही बात याद आती है : ‘न जाने किस भेष में मिल जाएं भगवान।’ हमारी एक बड़ी शक्ति हमारा दार्शनिक स्वभाव भी है। कर्म का सिद्धांत- जिसे अक्सर नियतिवाद कह दिया जाता है- अपने जीवंत अनुभव में समत्व का आमंत्रण है। यह संकेत देता है कि जीवन एक ब्रह्मांडीय नैतिक व्यवस्था के अनुरूप संचालित होता है।

प्रयास करना अनिवार्य है, किंतु परिणाम मनुष्य के नियंत्रण में नहीं होते। फल की आसक्ति त्यागकर अपने कर्तव्य का पालन करने का गीता का उपदेश हमारी सांस्कृतिक चेतना में गहराई तक समा चुका है। सदियों के आक्रमणों, औपनिवेशिक शोषण, विभाजन और दीर्घकालिक आर्थिक कठिनाइयों ने अस्तित्व-रक्षा की एक सामूहिक स्मृति को हमारे भीतर गहरे बैठा दिया है। सहते रहना यहां कोई असाधारण बात नहीं; एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है।

इसी सहनशीलता से एक स्थिरचित्त विनोदबोध जन्मा है- अपनी ही दुर्दशा पर हंस सकने की क्षमता। संसार मूलतः मायामय है- यह विश्वास भौतिक उपलब्धियों के आनंद को कम नहीं करता, किंतु विपत्ति के समय यह असफलता को दार्शनिक स्वीकार्यता का एक कवच अवश्य प्रदान करता है।

  • छोटे सुखों के लिए भारतीय प्रतिभा देखते ही बनती है। सड़क किनारे की दुकान पर चाय; क्रिकेट पर बहसें; भीड़भरी ट्रेनों में फूट पड़ने वाली हंसी- ये सब साधारण, मितव्ययी, किंतु गहरे संतोष देने वाली आत्मीयता के संस्कार हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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