लखनऊ में सीजन में पहली बार 41 डिग्री पहुंचा पारा: गर्म हवा के थपेड़े बढ़ाएंगे समस्या, अभी नहीं मिलेगी कोई राहत – Lucknow News h3>
लखनऊ में भीषण गर्मी की शुरुआत हो चुकी है। अधिकतम तापमान सीजन में पहली बार 41 डिग्री तक पहुंच चुका है। न्यूनतम तापमान भी अपने अधिकतम स्तर 24 डिग्री पर शनिवार को दर्ज किया गया। अधिकतम आर्द्रता 50 फीसदी और न्यूनतम आर्द्रता 16 फीसदी रहा। तड़के सुबह से ही तेज चटक धूप निकली है। पछुवा हवा 10 से 15 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल रही। गर्म हवा के थपेड़े के चलते लोगों की परेशानी बढ़ रही। इससे पारा अभी और बढ़ेगा। दिन में तेज धूप के साथ हवा चलती रहेगी। मौसम विभाग का अनुमान है कि आज लखनऊ का अधिकतम तापमान 42 डिग्री और न्यूनतम तापमान 24 डिग्री दर्ज किया जाएगा। दिन के साथ में रात का पारा भी साम्य से अधिक रहेगा। पछुवा हवा के असर से अभी और बढ़ेगा पारा लखनऊ समेत पूरे प्रदेश में अगले कुछ दिनों तक तापमान में अभी और बढ़त की संभावना है। मौसम वैज्ञानिक अतुल कुमार सिंह ने बताया कि शुष्क पछुवा हवा का असर बढ़ने और महाराष्ट्र श्रेत्र में प्रति चक्रवात के असर से पारा में बढ़त की संभावना बनी हुई है। वहीं, पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने से हवाओं की दिशा बदलेगी और आसमान में आंशिक रूप से बादल छा सकते हैं। इससे बढ़ते तापमान पर थोड़ा ब्रेक लगेगा। फिलहाल बारिश होने की कोई संभावना नहीं है, केवल गर्मी के तेवर थोड़े नरम पड़ सकते हैं। कम बारिश का अनुमान, खेती पर पड़ेगा असर मौसम विभाग के ताजा दीर्घकालिक पूर्वानुमान के मुताबिक, साल 2026 में उत्तर प्रदेश में मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार कई वैश्विक मौसम कारक बारिश को प्रभावित कर सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, उत्तरी गोलार्द्ध और यूरेशिया में सर्दियों व वसंत के दौरान बर्फ का फैलाव सामान्य से थोड़ा कम रहा है। वहीं, हिंद महासागर में अभी तटस्थ स्थिति है, जो मानसून के अंत तक सकारात्मक रूप ले सकती है। इसके बावजूद प्रशांत महासागर में चल रही कमजोर ला-नीना स्थिति जून तक खत्म होकर तटस्थ हो जाएगी। मौसम वैज्ञानिक अतुल कुमार सिंह ने बताया कि इसके बाद मानसून के दौरान अल-नीनो जैसी परिस्थितियां बनने की आशंका है, जो आमतौर पर भारत में बारिश कम करती हैं। यही वजह है कि मौसम विभाग ने यूपी और लखनऊ में इस बार कुल मानसूनी बारिश सामान्य से कम रहने की संभावना जताई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो इसका असर खेती और जल संसाधनों पर पड़ सकता है।
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