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संडे जज्बात-पापा को थप्पड़ मारे, मां को पीटा: पता चला कि गोद ली बेटी हूं तो 2 साल कमरे में बंद रही, दिनभर देखती थी क्राइम पेट्रोल

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संडे जज्बात-पापा को थप्पड़ मारे, मां को पीटा:  पता चला कि गोद ली बेटी हूं तो 2 साल कमरे में बंद रही, दिनभर देखती थी क्राइम पेट्रोल

संडे जज्बात-पापा को थप्पड़ मारे, मां को पीटा: पता चला कि गोद ली बेटी हूं तो 2 साल कमरे में बंद रही, दिनभर देखती थी क्राइम पेट्रोल


मैं एक अडॉप्टेड चाइल्ड हूं, सहर हाशमी। एक्टिविस्ट शबनम हाशमी और गौहर रजा की गोद ली हुई बेटी। मैं केवल 9 महीने की थी जब सगे मां-बाप अनाथालय छोड़ गए थे। जब अम्मा-पापा अनाथालय आए थे, तब मैं महज एक साल की थी। अम्मा बताती हैं कि मैं शीशे से उन्हें देख रही थी। जैसे ही वो लोग मेरे सामने पहुंचे, मैंने अपना हाथ उनकी तरफ बढ़ा दिया। अम्मा-पापा ने फौरन मेरा हाथ थाम लिया, जबकि उनका पहले से एक बेटा था साहिर हाशमी। कागजी कार्रवाई के बाद मुझे घर ले आए। घर में धूमधाम से मेरा स्वागत हुआ। मिठाई बांटी गई। मां बताती है कि साहिर भाई के दोस्त अक्सर स्कूल में बहनों की बातें किया करते थे। भाई सबकुछ सुनते रहते और घर आकर जिद करते कि मुझे भी बहन चाहिए। तब अम्मा और पापा ने तय किया कि हम एक बेटी गोद लेंगे। जब पांच साल की हुई तब पहली बार अम्मा ने बताया कि मुझे गोद लिया है। तब मुझे कुछ समझ नहीं आया। उसके कुछ समय बाद एक दफा मेंहदी लगाने के लिए अम्मा के साथ लाजपतनगर मार्केट जा रही थी। मुझे बहुत शौक था, जैसे ही मेंहदी का रंग फीका होता मैं दोबारा लगवा लेती थी। मेंहदी लगवाते हुए अचानक मैंने अम्मा से पूछा- साहिर भाई कैसे पैदा हुए हैं? अम्मा बोलीं- साहिर मेरे पेट से पैदा हुआ है। फिर मैंने पूछा क्या मैं भी आपके पेट से पैदा हुई हूं? अम्मा बोलीं- नहीं, तुम मेरे पेट से पैदा नहीं हुई हो। अम्मा की ये बात मेरे मन में बैठ गई। मैं सोचने लगी कि अम्मा ये क्या बोल रही हैं? मैं सच में इनकी बेटी नहीं हूं। तब तो ये लोग मुझे प्यार ही नहीं करते होंगे। मेरे लिए कभी कुछ करेंगे भी नहीं। सब कुछ साहिर भाई के लिए करेंगे। मुझे लंबे समय तक लगता रहा कि यह लोग मुझसे प्यार नहीं करते हैं। अम्मा-पापा दूसरे पैरेंट्स से बिलकुल अलग थे। किसी तरह की रोक-टोक नहीं करते थे। वो सोचते थे कि बच्चा अपने फैसले खुद लेना सीखे। जब मैं उनसे कुछ मांगती थी और नहीं मिलता था तब लगता था कि इनकी बेटी नहीं हूं इसलिए नहीं देते। जबकि वे लोग ठीक होते थे अपनी जगह। उनके पास पैसे नहीं होते थे। जैसे-जैसे मैं बड़ी हुई तो बाकी बच्चों से एकदम अलग होती चली गई। मेरे अंदर गुस्सा था। मैं गुस्से में हिंसक हो जाती थी। कुछ भी उठाकर फेंक देना, किसी को भी मार देना। उस वक्त अम्मा-पापा मेरी इन हरकतों को सामान्य समझते थे। कहते थे कि बच्चा है, कोई बात नहीं है। कुछ समय बाद साहिर भाई पढ़ाई के लिए बाहर चले गए। जब वो घर आते तो मुझे उनसे भी दिक्कत होती। ऐसे लगता कि ये क्यों आए हैं। मुझे हर बात पर शक होता जैसे कि कुछ अच्छा खाना बने तो मुझे लगता कि उनका बेटा है इसलिए बन रहा। अपने बेटे से हंस-हंस कर बात कर रहे हैं। ये सब देखते ही मैं वहां से उठकर चली जाती थी। भाई मुझसे इतना प्यार करते थे, तब भी मुझे उनसे दिक्कत होती थी।
शुरुआत में अम्मा-पापा को लगता था कि वे लोग मुझे समय नहीं दे पाते, इसलिए चिड़चिड़ी हो गई हूं। फिर उन्होंने एक साथ ट्रैवल करना बंद किया। दोनों में से एक हमेशा मेरे पास घर में रहते थे। फिर उन्होंने गूगल पर पढ़ना शुरू किया। उन्होंने काउंसलर से भी बात करी, लेकिन जब साल 2014 में मैंने बाहरवीं पास की और आत्महत्या की कोशिश की तो यह उनके लिए अति हो गई थी। फिर उन्हें काउंसलर ने कहा कि इसे साइकैट्रिक ट्रीटमेंट की जरूरत है, वरना वे अपना बच्चा खो देंगे। अगर कोई मुझे कह देता कि ये क्या पहन लिया, अच्छी नहीं लग रही हो। इतनी सी बात सुनकर मैं ट्रिगर हो जाती थी। अगर मुझसे कोई तेज आवाज में बात करे तो मैं सहन नहीं कर पाती थी। अगर अम्मा मुझे किसी बात पर व्हॉटसएप पर थम्स-अप साइन भेज देती तो मैं अपसेट हो जाती। सोचने लगती कि उन्होंने ठीक से बात नहीं की। मेरे लिए टाइम ही नहीं है उनके पास। फिर मैं बहुत गहरी सोच में चली जाती। मेरे शौक बहुत मंहगे होते थे। मुझे मंहगी चीजों की आदत हो गई थी। जब आईफोन XR आया तो मुझे चाहिए था। किसी तरह अम्मा-पापा ने मुझे EMI पर फोन दिलवाया और तीसरे दिन वह चोरी हो गया। मैं बहुत अपसेट हो गई। एक हफ्ते के बाद पापा ने मुझे दोबारा आईफोन दिलवाया तब मैं खुश हुई। मेरे लिए पैसे खर्च करना एक सेफ्टी वॉल जैसा था। जब मेजर ब्रेकडाउन होता तो मैं कुर्सी उठाकर मार देती थी। मुझे न सुनना बिलकुल पसंद नहीं है। अगर मैंने कोई चीज मांगी और पापा ने मना कर दी, तब तो मुझे वो चीज चाहिए ही होती थी। चाहे कुछ हो जाए। मैं खुद को मारने लगती थी। यहां तक की मैंनें अम्मा-पापा पर भी हाथ उठाया था। मेरा डॉग जो मुझे जान से ज्यादा प्यारा था, उसे भी उठाकर फेंक दिया था। अपना कमरा लॉक कर लेना। अम्मा को धक्का दे देना। घंटों तक रोना। आपा खो देना। मुझे सबसे आसान लगता था कि मैं खुद को मार लूं। मैं ही हर समस्या की जड़ हूं। फिर सिर दर्द हो जाता था तो पांच छह लोग मुझे एक दवा देने में लग जाते थे जिसके बाद मैं सो जाती थी। ऐसे में शॉपिंग या मंहगी चीजों की खरीदारी मेरे लिए सेफ्टी वॉल का काम करता था। बस तब मैं थोड़ा शांत हो जाती थी। एक दफा मैंने पापा पर हाथ उठाया था। उसके बाद देर रात मैं कमरे में ये सब सोचकर रो रही थी। शायद पापा ने मेरी आवाज सुन ली और भागकर कमरे में आए। मैंने उनसे कहा कि आप पर हाथ उठाया, आपको चोट लग गई। मुझे बहुत बुरा लग रहा है। मैं आपको मारना नहीं चाहती थी, लेकिन पता नहीं क्या हो जाता है। खुद को कंट्रोल नहीं कर पाती। पापा ने मुझे गले लगा लिया। फिर कहने लगे कि मैं जानता हूं। जब गुस्सा आए और तुम्हें लगे कि पापा को मारकर शांत हो सकती हो तो तुम मार लिया करो मुझे। मुझे बॉर्डर लाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर था। इसके अलग-अलग लक्षण होते हैं। मेरे अंदर था कि मुझे बहुत ज्यादा पैसा खर्च करना अच्छा लगता था। जब पैसे देने से अम्मा-पापा मना कर देते तो पूरे घर में हिंसा और तोड़-फोड़ होती थी। इसके अलावा मेरे अंदर आत्महत्या करने की बहुत इच्छा होती थी। मैंने बहुत बार कोशिश की, लेकिन बच गई। मैं खुद को बहुत नुकसान पहुंचाती थी। मैं खुद को बहुत नकारा समझती थी और लगता था कि मुझसे तो दुनिया में कुछ हो ही नहीं पाएगा। मैं तो बहुत बेचारी हूं। मेरी बीमारी के बारे में तब पता चला जब मैं 18 साल की हुई और आत्महत्या करने के लिए अपनी कलाई की नस काट ली थी। देर से डायग्नोस होने की वजह से मेरी और मेरे परिवार की जिंदगी के कीमती 18 साल बरबाद हो गए। सबसे बड़ी बात है कि इस बीमारी से ग्रस्त कोई इंसान अगर परिवार में है तो उसकी चपेट में पूरा परिवार आता है। मैंने आत्महत्या की कोशिश तो बहुत बार की है लेकिन साल 2014 वाला मुझे याद है। उस दिन अम्मा लैपटॉप पर काम कर रही थीं और मैं नीचे सोसाइटी के बच्चों के साथ खेल रही थी। हम रेड हैंड गेम खेल रहे थे। एक बच्चे ने मेरे हाथ पर बहुत तेज मार दिया। मैं रोते हुए घर आई और अम्मा को बताया। अम्मा काम में इतना व्यस्त थीं कि ध्यान नहीं दे पाईं। मैंने टेबल पर रखा कटर उठाया और कलाई काट ली। फिर मैंने कई बार छत से कूदने की कोशिश की। कई बार ट्रक के नीचे आने के लिए हाईवे पर भाग गई। मैं गिन नहीं सकती कि ऐसा कितनी बार किया मैंने। इन सब वजहों से घर का माहौल बहुत खराब रहता था। 24 घंटे घर में मेरे जैसा मरीज था, इसलिए अम्मा अक्सर रोती रहती थी। जो लोग मुझे पसंद नहीं थे, वे घर नहीं आ सकते थे। मुझे अच्छा नहीं लगता था। दो साल के लिए तो मैंने खुद को कमरे में लॉक कर लिया था। बाहर नहीं आती थी। शरीर 70 साल की औरत जैसा हो गया था। लाइट का बटन भी बंद नहीं कर पाती थी, शरीर इतना कमजोर हो गया था। रिमोट तक नहीं उठा पाती थी। बिस्तर पर बैठी चिल्लाती रहती थी कि खाने को दे दो। सारा दिन क्राइम पेट्रोल देखती थी। वहीं से मुझे आत्महत्या के ख्याल आते थे। एक साल तक मैं 10-10 घंटे तक पेंटिंग करती थी। पहले मैं सिर्फ ब्लैक एंड वाइट पेंटिंग करती थी। फिर कलरफुल बनानी शुरू की। साल 2016 में जब मां ने मेरी एक साल की पेंटिंग देखी तो बोलीं- हम एग्जीबिशन लगाएंगे। उनकी बात सुनते ही मैं डर गई। मुझे लगा कि घर में रहते हुए दो साल बीत गए हैं। अब मैं लोगों से बात कैसे करुंगी, कैसे लोगों का सामना करुंगी। अम्मा ने मुझे बहुत समझाया। उसके बाद बस अम्मा-पापा ने कहा कि तुम्हें साइकेट्रिस्ट के पास जाना चाहिए। लेकिन मैं मना कर देती थी। मुझे बॉलीवुड की फिल्में देखकर लगता था कि वहां तो पागल जाते हैं। वे लोग मुझे जंजीरों से बांध देंगे, कमरे में बंद कर देंगे। बिजली के झटके देंगे। जब मैं साइकेट्रिस्ट के पास गई तो बहुत अच्छा लगा। बच्चों के साइकेट्रिस्ट तो वैसे ही बहुत अच्छे होते हैं। वहां बहुत सारे पोस्टर लगे हुए थे, खिलौने थे। वहां जाते-जाते मुझे लगने लगा कि यह मेरे लिए कितना जरूरी है। समय बीतता गया, मेरी दवाइयां चलती रहीं। 20 साल डिप्रेशन में रहने के बाद धीरे-धीरे जिंदगी पटरी पर लौटने लगी। मैं अम्मा-पापा के साथ समय गुजारने लगी। उन्हें समझने लगी। बहुत साल तक तो मैं अपनी सगी मां से नफरत करती रही कि वह कितनी गंदी थीं जो अनाथालय छोड़ गईं। हालांकि अब ऐसा नहीं है। मौका मिले तो मैं अपनी सगी मां से जरूर मिलना चाहूंगी। मेरे लिए दिक्कत यह भी थी कि हर डॉक्टर हमसे फैमिली हिस्ट्री पूछता था। तब अम्मा-पापा बताते थे कि अडॉप्टेड चाइल्ड हूं। तब मैं बहुत गुस्सा करती थी लेकिन अब नहीं। अब कहीं जाकर मैं अडॉप्शन को लेकर नॉर्मल हुई हूं। मेरे लिए शबनम हाशमी और गौहर रजा ही असली मम्मी-पापा हैं। मैं उनसे बहुत प्यार करती हूं। आज मैं निफ्ट से सर्टिफाइड फैशन स्टाइलिश्ट और मोटीवेशनल स्पीकर हूं। मैंने मेंटल हेल्थ पर जो स्टिगमा बना हुआ है, उसे तोड़ने की शुरुआत की है। 11 मार्च 2024 को मैंने रॉयल इनफील्ड खरीदी और दुनिया से इसपर बात करने के लिए निकल गई। शहर दर शहर रॉयल इन फील्ड पर सबसे ज्यादा सेमिनार करने का विश्व रिकॉर्ड मेरे नाम है। मेरी सारी जिंदगी एक ऐसे अंधेरे नरक में गुजरी है कि मुझे लगता है कि मैं देश के कोने कोने में जाकर इसपर बात करूं। मैं बाइक पर जाती हूं। लोगों से बात करती हूं। उन्हें बताती हूं कि यह बीमारी नहीं है। (सहर हाशमी ने अपने जज्बात NEWS4SOCIALरिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए हैं) ———————- 1- संडे जज्बात-लोग भैंस, बुलडोजर आंटी कहते थे:30 की उम्र में 92 किलो वजन था- किडनी खराब होने लगी तो 100 दिन में 20 किलो घटाया मैं कानपुर की रहने वाली आभा शुक्ला हूं। भैंस, मोटी, 45 साल की आंटी, चलती-फिरती बुलडोजर, किसी के ऊपर गिर जाए, तो वो दबकर ही मर ही जाए… कभी ये सारे नाम मेरे ही थे। लोग मुझे इन्हीं नामों से बुलाते थे। मेरे असली नाम ‘आभा शुक्ला’ से नहीं। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- संडे जज्बात-दोस्त की प्रेमिका प्रेग्नेंट हुई, रेप केस मुझपर चला:पंचायत ने 6 लाख में सौदा किया, 5 साल जेल में रहा, अब बाइज्जत बरी बिहार के दरभंगा जिले का रहने वाला मैं मुकेश कुशवाहा। मुझ पर 17 साल की लड़की के रेप और पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा चला। वो लड़की मेरे दोस्त की प्रेमिका थी। दोस्त ने उसे प्रेग्नेंट किया था, लेकिन मुकदमा मुझ पर चला। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें