एन. रघुरामन का कॉलम: रील्स से रीडिंग तक : बच्चे फिर से बच्चे बन रहे हैं h3>
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5 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
मेरे कजिन गिरी और उनकी पत्नी राधिका का छह वर्ष का बड़ा बेटा अर्जुन जब स्कूल जाने लगा था तो उन दोनों ने स्क्रीम टाइम कम करने का फैसला किया। तब अर्जुन चार साल का था और जब राधिका खाना पकातीं तो अपनी छोटी बहन गायत्री के साथ अक्सर आईपैड पर बच्चों के शो देखता रहता था।
किंडरगार्टन की स्क्रीन-फ्री पॉलिसी के बारे में जानने के बाद गिरी ने यही नियम घर में भी लागू करने का फैसला किया। हैरानी की बात है कि बच्चों ने कोई शिकायत नहीं की। गिरी कहते हैं कि ‘हमने बड़ा बदलाव देखा। वे न सिर्फ शांत और स्थिर हुए, बल्कि दूसरी चीजों को लेकर उनकी जिज्ञासा भी बढ़ी।
वे बाहर जाते, पीछे वाले आंगन में मिट्टी खोद कर लकड़ियां, अकॉर्न और पत्थर चुनते।’ ढाई साल बाद भी वे अपने फैसले से पीछे नहीं हटे हैं। गिरी बताते हैं कि अर्जुन और गायत्री उस स्कूल में अच्छे-से पढ़ रहे हैं, जहां 12 साल की उम्र तक कोई डिवाइस नहीं दिए जाते।
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हमारे जीवन में 2026 के आगमन के साथ ही जहां दुनिया में ‘न्यू ईयर, न्यू मी’ का नारा गूंज रहा है, वहीं भारत की टेक कैपिटल बेंगलुरु के बच्चे हमें एक अलग संकल्प से चौंका रहे हैं- पढ़ने की ओर फिर से आकर्षित होना। वैश्विक स्तर पर यह बदलाव 2024 में ही दिखने लगा था।
फ्लोरिडा के एक बड़े शहरी जिले में परीक्षा में छात्रों के अंक बढ़ गए, जबकि यूरोप की ग्रामीण काउंटीज में छात्रों के व्यवहार से जुड़ी समस्याएं तेजी से कम हुईं। वजह है, क्लासरूम में स्मार्टफोन नहीं होना और इसीलिए रोजमर्रा में इसका इस्तेमाल भी कम होना।
हर वक्त बच्चे तक पहुंच बनाए रखने के आदी पैरेंट्स के कारण स्मार्टफोन को कक्षा से बाहर रखने का फैसला करने वाले स्कूलों को काफी दिक्कतें आईं। कई स्कूलों के लिए यह आज भी बड़ी चुनौती है। इसके बावजूद विकसित देशों के कई राज्यों ने स्कूलों में बच्चों द्वारा फोन का इस्तेमाल सीमित करने के नीति-नियम बनाए हैं।
कुछ ने तो फोन रखने के लिए फैराडे बैग देना शुरू किया है, जिनमें धातु की परत बनाकर सेलुलर, वाई-फाई, ब्लूटूथ, जीपीएस, एनएफसी और आरएफआईडी जैसे सभी वायरलेस सिग्नलों को ब्लॉक कर दिया जाता है। इससे बैग में रखे फोन तक कोई नेटवर्क नहीं पहुंच पाता।
प्रतिबंधों के पहले साल में कुछ जगहों पर नियम-विरुद्ध फोन इस्तेमाल करने वाले विद्यार्थियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई और उनके निलंबन के मामले बढ़े। लेकिन दूसरे साल, यानी 2025 के अंत में फोन के अत्यधिक इस्तेमाल वाले स्कूलों में भी पैरेंट्स और विद्यार्थियों ने यह नियम स्वीकार लिया।
उन्हें लगा कि उनके बच्चों को लेकर शिकायतें कम हुई हैं। कुछ स्कूलों में अनुशासनात्मक कार्रवाइयों में 89 प्रतिशत और निलंबन में 69 प्रतिशत तक गिरावट आई। इस बदलाव पर अध्ययन कर रहे यूनिवर्सिटी ऑफ रोचेस्टर के दो अर्थशास्त्र-शोधकर्ताओं ने दिसंबर के आखिर में, क्रिसमस अवकाश से ठीक पहले विद्यार्थियों के परीक्षा परिणामों में सुधार देखा।
वे अभी ग्रेड्स में सुधार को आंकड़ों में नहीं बदल पाए हैं, लेकिन उन्होंने छात्रों के प्रदर्शन में सुधार देखा है। लड़कों के स्कोर में डबल-डिजिट का सुधार दिखा और कॉलेजों में उपस्थिति भी कुछ प्रतिशत बढ़ी। यकीनन, लोग समझने लगे हैं कि फोन के कारण बच्चे अलग-सा व्यवहार करने लगते हैं और यही उनकी ग्रेड्स प्रभावित करता है।
शायद टेक सिटी ने हम सबसे पहले यह हवा भांप ली। बच्चे ही नहीं, कॉलेज छात्रों में भी पढ़ने की आदत आने लगी है। छात्र धीरे-धीरे समझ रहे हैं कि डूम-स्क्रॉलिंग में डूबे रह कर वे पेशेवर जगत में कदम नहीं रख सकते। अधिकतर कॉलेजों में अब न्यूजपेपर स्टैंड हैं और छात्र इन पर आकर पढ़ने के आनंद को फिर से खोज रहे हैं।
फंडा यह है कि जब आप बच्चों को ताली वाले पुराने खेल खेलते या लंच टाइम में एक-दूसरे से खाना शेयर करते देखते हैं तो शिक्षाविदों को मजबूती से यह लगता है कि स्क्रीन की गैर-मौजूदगी में बच्चे फिर से बच्चे बन रहे हैं।
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
मेरे कजिन गिरी और उनकी पत्नी राधिका का छह वर्ष का बड़ा बेटा अर्जुन जब स्कूल जाने लगा था तो उन दोनों ने स्क्रीम टाइम कम करने का फैसला किया। तब अर्जुन चार साल का था और जब राधिका खाना पकातीं तो अपनी छोटी बहन गायत्री के साथ अक्सर आईपैड पर बच्चों के शो देखता रहता था।
किंडरगार्टन की स्क्रीन-फ्री पॉलिसी के बारे में जानने के बाद गिरी ने यही नियम घर में भी लागू करने का फैसला किया। हैरानी की बात है कि बच्चों ने कोई शिकायत नहीं की। गिरी कहते हैं कि ‘हमने बड़ा बदलाव देखा। वे न सिर्फ शांत और स्थिर हुए, बल्कि दूसरी चीजों को लेकर उनकी जिज्ञासा भी बढ़ी।
वे बाहर जाते, पीछे वाले आंगन में मिट्टी खोद कर लकड़ियां, अकॉर्न और पत्थर चुनते।’ ढाई साल बाद भी वे अपने फैसले से पीछे नहीं हटे हैं। गिरी बताते हैं कि अर्जुन और गायत्री उस स्कूल में अच्छे-से पढ़ रहे हैं, जहां 12 साल की उम्र तक कोई डिवाइस नहीं दिए जाते।
हमारे जीवन में 2026 के आगमन के साथ ही जहां दुनिया में ‘न्यू ईयर, न्यू मी’ का नारा गूंज रहा है, वहीं भारत की टेक कैपिटल बेंगलुरु के बच्चे हमें एक अलग संकल्प से चौंका रहे हैं- पढ़ने की ओर फिर से आकर्षित होना। वैश्विक स्तर पर यह बदलाव 2024 में ही दिखने लगा था।
फ्लोरिडा के एक बड़े शहरी जिले में परीक्षा में छात्रों के अंक बढ़ गए, जबकि यूरोप की ग्रामीण काउंटीज में छात्रों के व्यवहार से जुड़ी समस्याएं तेजी से कम हुईं। वजह है, क्लासरूम में स्मार्टफोन नहीं होना और इसीलिए रोजमर्रा में इसका इस्तेमाल भी कम होना।
हर वक्त बच्चे तक पहुंच बनाए रखने के आदी पैरेंट्स के कारण स्मार्टफोन को कक्षा से बाहर रखने का फैसला करने वाले स्कूलों को काफी दिक्कतें आईं। कई स्कूलों के लिए यह आज भी बड़ी चुनौती है। इसके बावजूद विकसित देशों के कई राज्यों ने स्कूलों में बच्चों द्वारा फोन का इस्तेमाल सीमित करने के नीति-नियम बनाए हैं।
कुछ ने तो फोन रखने के लिए फैराडे बैग देना शुरू किया है, जिनमें धातु की परत बनाकर सेलुलर, वाई-फाई, ब्लूटूथ, जीपीएस, एनएफसी और आरएफआईडी जैसे सभी वायरलेस सिग्नलों को ब्लॉक कर दिया जाता है। इससे बैग में रखे फोन तक कोई नेटवर्क नहीं पहुंच पाता।
प्रतिबंधों के पहले साल में कुछ जगहों पर नियम-विरुद्ध फोन इस्तेमाल करने वाले विद्यार्थियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई और उनके निलंबन के मामले बढ़े। लेकिन दूसरे साल, यानी 2025 के अंत में फोन के अत्यधिक इस्तेमाल वाले स्कूलों में भी पैरेंट्स और विद्यार्थियों ने यह नियम स्वीकार लिया।
उन्हें लगा कि उनके बच्चों को लेकर शिकायतें कम हुई हैं। कुछ स्कूलों में अनुशासनात्मक कार्रवाइयों में 89 प्रतिशत और निलंबन में 69 प्रतिशत तक गिरावट आई। इस बदलाव पर अध्ययन कर रहे यूनिवर्सिटी ऑफ रोचेस्टर के दो अर्थशास्त्र-शोधकर्ताओं ने दिसंबर के आखिर में, क्रिसमस अवकाश से ठीक पहले विद्यार्थियों के परीक्षा परिणामों में सुधार देखा।
वे अभी ग्रेड्स में सुधार को आंकड़ों में नहीं बदल पाए हैं, लेकिन उन्होंने छात्रों के प्रदर्शन में सुधार देखा है। लड़कों के स्कोर में डबल-डिजिट का सुधार दिखा और कॉलेजों में उपस्थिति भी कुछ प्रतिशत बढ़ी। यकीनन, लोग समझने लगे हैं कि फोन के कारण बच्चे अलग-सा व्यवहार करने लगते हैं और यही उनकी ग्रेड्स प्रभावित करता है।
शायद टेक सिटी ने हम सबसे पहले यह हवा भांप ली। बच्चे ही नहीं, कॉलेज छात्रों में भी पढ़ने की आदत आने लगी है। छात्र धीरे-धीरे समझ रहे हैं कि डूम-स्क्रॉलिंग में डूबे रह कर वे पेशेवर जगत में कदम नहीं रख सकते। अधिकतर कॉलेजों में अब न्यूजपेपर स्टैंड हैं और छात्र इन पर आकर पढ़ने के आनंद को फिर से खोज रहे हैं।
फंडा यह है कि जब आप बच्चों को ताली वाले पुराने खेल खेलते या लंच टाइम में एक-दूसरे से खाना शेयर करते देखते हैं तो शिक्षाविदों को मजबूती से यह लगता है कि स्क्रीन की गैर-मौजूदगी में बच्चे फिर से बच्चे बन रहे हैं।
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