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रातभर धमाके, ब्लास्टिंग से मकानों में दरारें: अरावली में खनन ने 5 नदियों का गला घोंटा,18 गांवों में लोग घर छोड़ने का मजबूर, पार्ट-3 – Rajasthan News

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रातभर धमाके, ब्लास्टिंग से मकानों में दरारें:  अरावली में खनन ने 5 नदियों का गला घोंटा,18 गांवों में लोग घर छोड़ने का मजबूर, पार्ट-3 – Rajasthan News

रातभर धमाके, ब्लास्टिंग से मकानों में दरारें: अरावली में खनन ने 5 नदियों का गला घोंटा,18 गांवों में लोग घर छोड़ने का मजबूर, पार्ट-3 – Rajasthan News

हमारे यहां 2 हजार फीट नीचे तक पानी नहीं है, पहले पहाड़ियों के कारण 200-300 फीट नीचे पानी आ जाता था।

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5 पंचायतों के 18 गांवों में माफियाओं के डंपर चलते हैं, घर-जमीन छोड़ने का दबाव बनाते हैं।

12 महीने बहने वाली बनास, गंभीरी, सहाबी जैसी नदियां विलुप्त होने की कगार पर हैं।

ये दर्द उन लोगों का है जिनके गांव, घर और खेती की जमीन अरावली पर्वतमाला के आसपास हैं। अब यहां खनन माफियाओं का कब्जा है। पिछले 15-20 साल से यहां इतना खनन हुआ है कि लोग गांव छोड़ने को मजबूर हो गए हैं।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा दी है, जिसके मुताबिक 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली हिल्स माना जाएगा। इससे अब गांव वालों का ये डर और भी बढ़ गया है।

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इस परिभाषा ने माफियाओं के लिए नए दरवाजे खोल दिए हैं। एक्सपर्ट का कहना है कि पहले ही अत्यधिक खनन से 700 मीटर लंबी इस पर्वत श्रंखला में 12 बड़े गैप्स बन गए हैं, जिससे रेगिस्तान दिल्ली की तरफ पहुंचने लगा है। अब इसके और गंभीर परिणाम होंगे।

NEWS4SOCIALने खनन के हालातों को जाना। पढ़िए ये रिपोर्ट

गिरजन नदी के पास ही क्रेशर प्लांट चल रहा है। ग्रामीणों का आरोप है यहां अवैध खनन हो रहा है।

खनन ने नदियों का गला घोंटा, 550 से ज्यादा क्रेशर प्लांट संचालित

एनवायरमेंट एक्टिविस्ट कैलाश मीणा 30 साल से अरावली बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि नीमकाथाना, कोटपुतली, सीकर, झुंझुनूं और अलवर में पहाड़ियों को तोड़कर क्रेशर बनाया जा रहा है।

अकेले नीमकाथाना और कोटपूतली क्षेत्र में 550 से ज्यादा स्टोन क्रेशर, बजरी प्लांट और माइनिंग चल रही है। नीम का थाना कोटपूतली स्टेट हाईवे से रोज 1700 से ज्यादा डंपर निकलते हैं।

मीणा ने बताया कि फॉरेस्ट रिजर्व, संरक्षित वन एवं चरागाह से लेकर 12 महीने बहने वाली नदियों की रेंज में भी क्रेशर प्लांट्स चल रहे हैं।

इसके चलते नीमकाथाना और इसके आस पास के पहाड़ों से निकलने वाली बरसाती नदियां लुप्त होने की कगार पर हैं। इनमें बनास, गंभीरी, सहाबी नदी शामिल हैं।

  • नीमकाथाना के गणेश्वर और बलेश्वर के पहाड़ों से करीब 16 किमी लंबी गिरजन नदी बहती है जो बुचाणा डैम में गिरने के बाद आगे सोता नदी के नाम से बहती है।
  • ऐसे ही रायपुर पाटन बांध के पास कासावती नदी अब महज एक नाले के रूप में रह गई है। यहां इसके आस पास वर्तमान में 25 से ज्यादा क्रेशर प्लांट हैं।

कासावती नदी के बहाव क्षेत्र में 25 से ज्यादा क्रेशर प्लांट हैं।

5 पंचायतों के 18 गांवों पर संकट, घर-जमीन छोड़ने का दबाव

नीमकाथाना के रामलियावास, किशनपुरा, शहदाला-भगवानपुरा, भुरजमीढ, कुशलपुरा, भोजपुरा, शावलपुरा, लुहारवास, प्रेमपुरा और अविनाशी वो गांव हैं, जहां अरावली की पहाड़ियों में अंधाधुंध माइनिंग चल रही है।

लीज पर चल रहे क्रेशर प्लांट और माइनिंग के चलते अब इन गांवों की पहचान खतरे में पड़ गई है। 5 पंचायतों के करीब 18 से ज्यादा गांव अवैध खनन, ब्लास्टिंग और फेफड़ों को छलनी कर देने वाली बारीक धूल में भी सांस लेकर अपनी जमीन बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

शहदाला-भगवानपुरा के किसान मामराज मीणा कहते हैं- हमारे खेतों और घरों के आस-पास की 180 हेक्टेयर जमीन एक कंपनी को 50 सालों के लिए लीज पर दे दी है।

ये क्षेत्र गिरजन नदी में आता है। कंपनी ने तारबंदी भी शुरू कर दी है। लेकिन हमें न तो हमारे घर और जमीन के बदले कोई मुआवजा मिला है न ही कोई सहायता राशि।

प्रशासन भी हमारी मजबूरी नहीं सुन रहा। यहां सभी पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर से ज्यादा है। अब तक 1000 से ज्यादा पेड़ों की बलि चढ़ चुकी है।

पास ही के गांव के कैलाश मीणा बताते हैं कि प्रशासन हमारी किसी भी दलील और शिकायत को नहीं सुन रहा है। करीब 70-80 सालों से हम यहां रह रहे हैं और अब हम पर इस इलाके को छोड़ने को दबाव बनाया जा रहा है।

हालांकि, हमें अब भी कोर्ट पर भरोसा है। 100 से 150 घर तो अकेले इस माइनिंग के क्षेत्र में सीधे आ रहे हैं। इस पुरानी नदी को नाला बताकर लीज ली गई है।

ब्लास्टिंग से मकानों में दरारें, माफिया से लोग घर छोड़ गए

किशनपुरा गांव की सुनीता ने अपने घर ले जाकर खनन की ब्लास्टिंग से आई दरारें दिखाई। नियमानुसार माइनिंग प्लांट आबादी से 1500 मीटर दूर होना चाहिए।

लेकिन यहां घरों से महज 500 मीटर दूर ही आधा दर्जन क्रेशर प्लांट हैं। रात भर बारूद के धमाकों से हर वक्त घर की छतों के गिरने, जख्मी होने का डर बना रहता है।

प्रेमपुरा की ढाणी के नीरज कुमार वर्मा दिल्ली में नौकरी करते थे। आए दिन खनन माफिया गांव में आकर परिजनों को परेशान करते थे। ऐसे में नौकरी छोड़ यहीं रहने लगे।

नीरज बताते हैं कि खनन माफिया ने अरावली रेंज में आने वाली उनकी खातेदारी की जमीन पर भी लीज हासिल कर ली है।इस जमीन में नलकूप, कुएं, चरागाह, ओरण और वन विभाग की जमीन भी है। बावजूद इसके लीज की परमिशन मिल गई।

किशनपुरा में तो गांव की सीमा पर ही खनन का काम चल रहा है। आस-पास के मकानों में रहने वाले लोग ब्लास्टिंग, शोर शराबे, धूल मिट्टी और माफिया के डर से मजबूरी में घर छोड़कर ही चले गए।

तय सीमा से ज्यादा खनन के चलते इस इलाके के ज्यादातर पहाड़ अंदर तक खोखले हो चुके हैं। कैलाश मीणा कहते हैं कि अत्यधिक खनन के चलते भूजल स्तर लगातार गिरता जा रहा है।

अरावली की चट्टानें बारिश के पानी को जमीन में सोखने में मदद करती हैं। खनन से कई जगहों पर भूजल स्तर 1000-2000 फीट तक गिर चुका है। आगे और नदियां-तालाब सूख जाएंगे, राजस्थान ही नहीं उत्तर-पश्चिम भारत में पानी का संकट गहरा जाएगा।

ब्लास्टिंग के कारण आप पास के कई घरों में ऐसी दरारें आ गई हैं।

डंपर माफियाओं ने किए 108 हादसे, लोगों पर फायरिंग तक हो चुकी

खेती बाड़ी खत्म होने, जल संसाधन और स्थाई आजीविका के साधन नष्ट होने से युवाओं में अपराध भी बढ़ रहा है। खनन माफिया युवाओं को अपने अवैध कामों में इन युवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं।

फाइनेंस पर ट्रक, डंपर दिलवाकर खनन के काम में इस्तेमाल किया जा रहा है। विरोध करने वालों को धमकाना, घर मकान खली करवाना जैसी बातें अब आम हैं।

समाज शास्त्र के रिटायर्ड प्रोफेसर लाल चंद मीणा कहते हैं कि खनन के चलते पर्यावरण संकट खड़ा हो गया है। लोग सांस और फेफड़ों की समस्याओं से जूझ रहे हैं। पीने का पानी लगातार गिरता जा रहा है। अपराधीकरण बहुत तेजी से बढ़ा है।

डाबला गांव के संदीप मीणा पर अक्टूबर में कुछ लोगों ने मामूली झगड़े के बाद गोली चला दी थी। गनीमत रही कि गोली दाएं हाथ के बाजू में लगी और फंसकर रह गई। पहली भी फायरिंग हुई है।

डंपर माफिया इलाके में बीते 10 महीनों में 100 से ज्यादा एक्सीडेंट कर चुके हैं जिनमें 43 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी हैं। इनमें पुलिस वाले भी शामिल हैं।

इलाके में सुबह से ही डंपरों की आवाजाही शुरू हो जाती है। जो देर रात तक चलती है।

12 से ज्यादा दरारों से दिल्ली तक पहुंच रही थार की धूल

पर्यावरण कार्यकर्ता नीलम अहलूवालिया ने बताया कि पिछले कुछ दशकों में अत्यधिक खनन (वैध और अवैध) से अरावली में 12 से ज्यादा बड़े-बड़े गैप (दरार) बन गए हैं।

यानी पर्वत श्रंखला के बीच कई पहाड़ियों का वजूद लगभग खत्म हो गया। पहले पहाड़ियां होने के कारण रेगिस्तान से उड़ने वाली मिट्टी वहीं रुक जाती थी। अब इन दरारों से थार रेगिस्तान की रेत उड़कर दिल्ली-एनसीआर तक पहुंच रही है।

अहलूवालिया ने बताया कि ये गैप्स 20-100 मीटर ऊंचाई वाली पहाड़ियों में बने हैं। अगर खनन जारी रहा, तो ये गैप और बड़े हो सकते हैं। रेगिस्तान तेजी से उत्तर भारत के शहरों की तरफ बढ़ेगा।

राजस्थान के लिए यह सबसे ज्यादा चिंता करने वाली बात है क्योंकि अरावली का 27 जिलों में फैलाव है। इन जिलों की जलवायु अरावली हिल्स से ही जुड़ी है।

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